अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ ।
कहँ तू , कहँ कोसलधनी , तोको कहा कहत सब कोइ ॥१॥
रीझि निवाज्यो कबहिं तू , कब खीझि दई तोहिं गारि ।
दरपन बदन निहारिकै , सुबिचारि मान हिय हारि ॥२॥
बिगरी जनम अनेककी सुधरत पल लगै न आधु ।
' पाहि कृपानिधि ' प्रेमसों कहे को न राम किया साधु ॥३॥
बालमीकि - केवट - कथा , कपि - भलि - भालु - सनमान ।
सुनि सनमुख जो न रामसों , तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥४॥
का सेवा सुग्रीवकी , का प्रीति - रीति - निरबाहु ।
जासु बंधु बध्यो ब्याध ज्यों , सो सुनत सोहात न काहु ॥५॥
भजन बिभीषनको कहा , फल कहा दियो रघुराज ।
राम गरीब - निवाजके बड़ी बाँह - बोलकी लाज ॥६॥
जपहि नाम रघुनाथको , चरचा दूसरी न चालु ।
सुमुख , सुखद , साहिब , सुधी , समरथ , कृपालु , नतपालु ॥७॥
सजल नयन , गदगद गिरा , गहबर मन , पुलक सरीर ।
गावत गुनगन रामके केहिकी न मिटि भव - भीर ॥८॥
प्रभु कृतग्य सरबग्य हैं , परिहरु पाछिली गलानि ।
तुलसी तोसों रामसों कछु नई न जान - पहिचानि ॥९॥
भावार्थः - अब भी यदि तू अपनी ( नीच करतूतोंको ) और श्रीरामजीके ( दयासे पूर्ण ) करतबोंको समझ ले तो तेरा कल्याण हो सकता है ; कहाँ तू ( रामविमुख , विषयोंमें लगा हुआ जीव ) और कहाँ ( अहैतुकी दयाके समुद्र ) कोशलपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ! तुझे सब लोग क्या कहते हैं ? ( कि यह रामका भक्त है । भक्त और भगवानमें कोई भेद नहीं होता । ऐसा कहलाना क्या तेरी करतूतोंका फल हैं ? ) ॥१॥
अरे , जरा ( विवेकरुपी ) दर्पणमें ( अपने मनरुपी ) मुखको तो देख कि कब तो श्रीरामजीने प्रसन्न होकर तुझपर कृपा की है और कब गुस्सेमें आकर तुझे गालियाँ दी है ? ( विचारनेसे तुझे यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि श्रीरामने तो सदा कृपा ही क्या है , जो कुछ दोष है , सो तेरा ही है । भगवान् गुस्से होकर गालियाँ देने लगें तो जीवका निस्तार ही कैसे हो ? ) फिर ( अपनी करतूतोंके लिये ) अपनी हार मान ( न तो यह समझ कि मेरी करनीसे मैं भक्त कहलाया हूँ और न उनपर दोषारोपण ही कर कि भक्त होनेपर भी वे मेरा उद्धार क्यों नहीं करते ? ) ॥२॥
अरे , ( उनको उद्धार करते देर ही क्या लगती है ) अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई दशा सुधारनेमें उन्हें आधा पल भी नहीं लगता । ' हे कृपानिधान ! मेरी रक्षा कीजिये ' - प्रेमसे इतना कहते ही ऐसा कौन पापी है जिसको श्रीरामचन्द्रजीने ( सच्चा ) साधु नहीं बना दिया ? ॥३॥
वाल्मीकि और गुह निषादकी कथा तथा सुग्रीव , हनुमान , शबरी , रीछ जाम्बवान आदिके आदर - सत्कारकी बात सुनकर भी जो श्रीरामजीके शरण नहीं हुआ , उस ( मूर्ख ) - को कौन ज्ञानका उपदेश कर सकता है ? ॥४॥
सुग्रीवने कौन सी सेवा की , और कौन - सी प्रीतिकी रीति निबाही थी ? ( राज्य पाकर वह तो श्रीरामजीके कार्यको भूल गया ! ) पर उसके भी भाई बालिको ( अपने ऊपर कलंक लेकर भी ) व्याधकी नाईं मार डाला । इस प्रकार मारनेकी बात सुनकर ( भक्तोंके अतिरिक्त और ) किसीको भी वह अच्छी नहीं लगती ॥५॥
विभीषणने कौन - सा भजन किया था ? किन्तु रघुनाथजीने उसे , उसके बदलेमें क्या फल दिया ( लंकाका महान् साम्राज्य और अपना अचल प्रेम ) । ) असलमें गरीबनिवाज श्रीरामचन्द्रजीको ( शरणागतके ) रक्षा करनेके वचनकी बड़ी लाज है । ( शरण आये हुए के पिछले कर्मोंकी ओर वे देखते ही नहीं ) ॥६॥
इसलिये तू रघुनाथजीका ही नाम जपा कर , दूसरी चर्चा ही न चलाया कर , क्योंकि सुन्दर , सुख देनेवाले , बुद्धिमान् , समर्थ , कृपासागर और शरणागतकी रक्षा करनेवाले स्वामी एक वही हैं ॥७॥
ऐसा कौन है जिसने आँखोंमें आँसू भरकर , गदगद वाणीसे , प्रेमपूर्ण चित्तसे तथा पुलकित होकर श्रीरामचन्द्रजीकी गुणावलिका गान किया हो , और उसका सांसारिक कष्ट ( जन्म - मरण ) नहीं छूट गया हो ? ॥८॥
पश्चात्ताप करना छोड़ दें । प्रभु रामचन्द्रजी उपकार मानने वाले और सभी बाहर - भीतरकी , आगे - पीछेकी बातोंको जाननेवाले हैं ( उनसे तेरी कोई करनी छिपी नहीं हैं ) । तुलसीदास ! रामजीसे तेरी कुछ नयी जान - पहचान नहीं है । ( उनपर दृढ़ भरोसा रख ) ॥९॥