संस्कृत सूची|संस्कृत साहित्य|पुराण|श्री स्कंद पुराण|नागरखण्ड| अध्याय २४६ नागरखण्ड अध्याय १ अध्याय २ अध्याय ३ अध्याय ४ अध्याय ५ अध्याय ६ अध्याय ७ अध्याय ८ अध्याय ९ अध्याय १० अध्याय ११ अध्याय १२ अध्याय १३ अध्याय १४ अध्याय १५ अध्याय १६ अध्याय १७ अध्याय १८ अध्याय १९ अध्याय २० अध्याय २१ अध्याय २२ अध्याय २३ अध्याय २४ अध्याय २५ अध्याय २६ अध्याय २७ अध्याय २८ अध्याय २९ अध्याय ३० अध्याय ३१ अध्याय ३२ अध्याय ३३ अध्याय ३४ अध्याय ३५ अध्याय ३६ अध्याय ३७ अध्याय ३८ अध्याय ३९ अध्याय ४० अध्याय ४१ अध्याय ४२ अध्याय ४३ अध्याय ४४ अध्याय ४५ अध्याय ४६ अध्याय ४७ अध्याय ४८ अध्याय ४९ अध्याय ५० अध्याय ५१ अध्याय ५२ अध्याय ५३ अध्याय ५४ अध्याय ५५ अध्याय ५६ अध्याय ५७ अध्याय ५८ अध्याय ५९ अध्याय ६० अध्याय ६१ अध्याय ६२ अध्याय ६३ अध्याय ६४ अध्याय ६५ अध्याय ६६ अध्याय ६७ अध्याय ६८ अध्याय ६९ अध्याय ७० अध्याय ७१ अध्याय ७२ अध्याय ७३ अध्याय ७४ अध्याय ७५ अध्याय ७६ अध्याय ७७ अध्याय ७८ अध्याय ७९ अध्याय ८० अध्याय ८१ अध्याय ८२ अध्याय ८३ अध्याय ८४ अध्याय ८५ अध्याय ८६ अध्याय ८७ अध्याय ८८ अध्याय ८९ अध्याय ९० अध्याय ९१ अध्याय ९२ अध्याय ९३ अध्याय ९४ अध्याय ९५ अध्याय ९६ अध्याय ९७ अध्याय ९८ अध्याय ९९ अध्याय १०० अध्याय १०१ अध्याय १०२ अध्याय १०३ अध्याय १०४ अध्याय १०५ अध्याय १०६ अध्याय १०७ अध्याय १०८ अध्याय १०९ अध्याय ११० अध्याय १११ अध्याय ११२ अध्याय ११३ अध्याय ११४ अध्याय ११५ अध्याय ११६ अध्याय ११७ अध्याय ११८ अध्याय ११९ अध्याय १२० अध्याय १२१ अध्याय १२२ अध्याय १२३ अध्याय १२४ अध्याय १२५ अध्याय १२६ अध्याय १२७ अध्याय १२८ अध्याय १२९ अध्याय १३० अध्याय १३१ अध्याय १३२ अध्याय १३३ अध्याय १३४ अध्याय १३५ अध्याय १३६ अध्याय १३७ अध्याय १३८ अध्याय १३९ अध्याय १४० अध्याय १४१ अध्याय १४२ अध्याय १४३ अध्याय १४४ अध्याय १४५ अध्याय १४६ अध्याय १४७ अध्याय १४८ अध्याय १४९ अध्याय १५० अध्याय १५१ अध्याय १५२ अध्याय १५३ अध्याय १५४ अध्याय १५५ अध्याय १५६ अध्याय १५७ अध्याय १५८ अध्याय १५९ अध्याय १६० अध्याय १६१ अध्याय १६२ अध्याय १६३ अध्याय १६४ अध्याय १६५ अध्याय १६६ अध्याय १६७ अध्याय १६८ अध्याय १६९ अध्याय १७० अध्याय १७१ अध्याय १७२ अध्याय १७३ अध्याय १७४ अध्याय १७५ अध्याय १७६ अध्याय १७७ अध्याय १७८ अध्याय १७९ अध्याय १८० अध्याय १८१ अध्याय १८२ अध्याय १८३ अध्याय १८४ अध्याय १८५ अध्याय १८६ अध्याय १८७ अध्याय १८८ अध्याय १८९ अध्याय १९० अध्याय १९१ अध्याय १९२ अध्याय १९३ अध्याय १९४ अध्याय १९५ अध्याय १९६ अध्याय १९७ अध्याय १९८ अध्याय १९९ अध्याय २०० अध्याय २०१ अध्याय २०२ अध्याय २०३ अध्याय २०४ अध्याय २०५ अध्याय २०६ अध्याय २०७ अध्याय २०८ अध्याय २०९ अध्याय २१० अध्याय २११ अध्याय २१२ अध्याय २१३ अध्याय २१४ अध्याय २१५ अध्याय २१६ अध्याय २१७ अध्याय २१८ अध्याय २१९ अध्याय २२० अध्याय २२१ अध्याय २२२ अध्याय २२३ अध्याय २२४ अध्याय २२५ अध्याय २२६ अध्याय २२७ अध्याय २२८ अध्याय २२९ अध्याय २३० अध्याय २३१ अध्याय २३२ अध्याय २३३ अध्याय २३४ अध्याय २३५ अध्याय २३६ अध्याय २३७ अध्याय २३८ अध्याय २३९ अध्याय २४० अध्याय २४१ अध्याय २४२ अध्याय २४३ अध्याय २४४ अध्याय २४५ अध्याय २४६ अध्याय २४७ अध्याय २४८ अध्याय २४९ अध्याय २५० अध्याय २५१ अध्याय २५२ अध्याय २५३ अध्याय २५४ अध्याय २५५ अध्याय २५६ अध्याय २५७ अध्याय २५८ अध्याय २५९ अध्याय २६० अध्याय २६१ अध्याय २६२ अध्याय २६३ अध्याय २६४ अध्याय २६५ अध्याय २६६ अध्याय २६७ अध्याय २६८ अध्याय २६९ अध्याय २७० अध्याय २७१ अध्याय २७२ अध्याय २७३ अध्याय २७४ अध्याय २७५ अध्याय २७६ अध्याय २७७ अध्याय २७८ अध्याय २७९ विषयानुक्रमणिका नागरखण्डः - अध्याय २४६ भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) ने कथन केल्यामुळे ह्या पुराणाचे नाव 'स्कन्दपुराण' आहे. Tags : puransanskrutskand puranपुराणसंस्कृतस्कन्द पुराण अध्याय २४६ Translation - भाषांतर ॥ गालव उवाच ॥शक्रादयस्तु देवेशा दुःखसंतप्तमानसाः ॥ईश्वरादर्शनभ्रांतमनः कर्मेंद्रिया रतिम् ॥१॥न प्रापुर्लोकनाथं ते कृत्वा यः प्रतिमाकृतिम् ॥तपसाराधयामासुः सर्वभूतहृदिस्थितम् ॥२॥कपर्दशिरसं देवं शूलहस्तं पिनाकिनम् ॥कपालखट्वांगधरं दशहस्तं किरीटिनम् ॥३॥उमासहितमीशानं पंचवक्त्रं महाभुजम् ॥कर्पूरगौरदेहाभं सितभूतिविभूषितम् ॥४॥नागयज्ञोपवीतेन गजचर्मसमन्वितम् ॥कृष्णसारत्वचा चापि कृतप्रावरणं विभुम् ॥५॥कृतध्यानाः सुरास्तत्र वृक्षाधारे समाश्रिताः ॥व्रतचर्यां समाश्रित्य प्रचक्रुस्तप उत्तमम् ॥६॥षडक्षरेण मंत्रेण शैवेन विहिताः सुराः ॥ ॥ शूद्र उवाच ॥व्रतचर्या त्वया या सा प्रोक्ता संजा यते कथम् ॥७॥ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि न तृप्येते वचोऽमृतैः ॥८॥ ॥ गालव उवाच ॥जपन्भस्म च खट्वांगं कपालं स्फाटिकं तथा ॥रुंडमालां पंचवक्त्रमर्द्धचंद्रं च मूर्द्धनि ॥९॥चित्रकृत्तिपरीधानं कौपीनकुण्डलद्वयम् ॥घंटायुग्मं त्रिशूलं च सूत्रं चर्यास्वरूपकम् ॥१०॥अमीभिर्लक्षणैर्लक्ष्यं मयोक्तं तव शूद्रज ॥अनेन विधिना सर्वे देवा वह्निपुरोगमाः ॥११॥सर्व आराधयामासुः सर्वोपायैर्वरप्रदम् ॥चातुर्मास्ये च संपूर्णे सपूर्णे कार्तिकेऽमले ॥१२॥चीर्णव्रतान्सुरान्दृष्ट्वा विशुद्धांश्च महेश्वरः ॥मतिं तेषां ददौ तुष्टो जीवात्मा सर्वभूतदृक् ॥१३॥शतरुद्रीयजाप्येन विधानसहितेन च ॥ध्यानेन दीपदानेन चातुर्मास्ये तुतोष सः ॥१४॥पूजनैः षोडशविधैर्यथा विष्णोस्तथा हरे ॥कुर्वाणान्भक्तिभावेन ज्ञात्वा देवान्समागतान् ॥१५॥प्रहृष्टो भगवान्रुद्रो ददौ तेषां शुभा मतिम् ॥ततः संमंत्र्य ते देवा वह्निं स्तुत्वा यथार्थतः ॥१६॥प्रसन्नवदनं चक्रुः कार्यसाधनतत्परम् ॥कर्मसाक्षी महातेजाः कृत्वा पारावतं वपु ॥१७॥प्रविवेश ततो मध्ये द्रष्टुं देवं महेश्वरम् ॥चकार गतिविक्षेपं गुंठनैरवगुंठनैः ॥१८॥लुंठनैः सर्पणैश्चैव चारुरूपोऽद्भुतां गतिम् ॥तं दृष्ट्वा भगवांस्तत्र कारणं समबुद्ध्यत ॥१९॥ऊर्ध्वरेतास्ततस्तस्मिन्ससर्जादौ दधार तत् ॥वीर्यं वह्निमुखे चैव सोत्पपात गृहाद्बहिः ॥२०॥गते तस्मिन्पतंगेऽथ पार्वती विफलश्रमा ॥संक्रुद्धा सर्वदेवानां सा शशाप महेश्वरी ॥२१॥यस्मान्ममेच्छा विहता भवद्भिर्दुष्टबुद्धिभिः ॥तस्मात्पाषाणतामाशु व्रजंतु त्रिदिवौकसः ॥२२॥निरपत्या निर्दयाश्च सर्वे देवा भविष्यथ ॥ततः प्रसादयामासुः प्रणताः शापयंत्रिताः ॥२३॥महद्दुःखं संप्रविष्टाः पुनः पुनरथाब्रुवन् ॥२४॥ ॥ देवा ऊचुः ॥त्वं माता सर्वदेवानां सर्वसाक्षी सनातनी ॥उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं जगतां सदा ॥२५॥भूतप्रकृतिरूपा त्वं महाभूतसमाश्रिता ॥अपर्णा तपसां धात्री भूतधात्री वसुन्धरा ॥२६॥मंत्राराध्या मन्त्रबीजं विश्वबीजलयस्थितिः ॥यज्ञादिफलदात्री च स्वाहारूपेण सर्वदा ॥२७॥मन्त्रयन्त्रसमोपेता ब्रह्मविष्णुशिवादिषु ॥नित्यरूपा महारूपा सर्वरूपा निरञ्जना ॥२८॥दोषत्रयसमाक्रान्त जननैः श्रेयसप्रदा ॥महालक्ष्मीर्महाकालीमहादेवी महेश्वरी ॥२९॥विश्वेश्वरी महामाया मायाबीजवरप्रदा ॥वररूपा वरेण्या त्वं वरदात्री वरासुता ॥३०॥बिल्वपत्रैः शुभैर्ये त्वां पूजयन्ति नराः सदा ॥तेषां राज्यप्रदात्री च कामदा सिद्धिदा सदा ॥३१॥चातुर्मास्येऽर्चिता यैस्त्वं बिल्वपत्रैर्विशेषतः ॥तेषां वांछितसिद्ध्यर्थं जाता कामदुघा स्वयम् ॥३२॥येऽर्चयंति सदा लोके महेश्वरसमन्विताम् ॥बिल्वपत्रैर्महाभक्त्या न तेषां दुःखदुष्कृती ॥३३॥चातुर्मास्ये विशेषेण तव पूजा महाफला ॥अद्यप्रभृति यैर्लोकैर्बिल्वपत्रैस्तु पूजिता ॥३४॥विधास्यसि महेशानि तेषां ज्ञानमनुत्तमम् ॥चातुर्मास्येऽधिकफलं बिल्वपत्रं वरानने ॥३५॥उमामहेश्वरप्रीत्यै दत्तं विधिवदक्षयम् ॥यथा श्रीस्तुलसीवृक्षे तथा बिल्वे च पार्वती ॥३६॥त्वं मूर्त्या दृश्यसे विश्वं सकलाभीष्टदायिनी ॥चातुर्मास्ये विशेषेण सेवितौ द्वौ महाफलौ ॥३७॥इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां षष्ठे नागरखण्डे हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये शेषशाय्युपाख्याने ब्रह्मनारदसंवादे चातुर्मास्य माहात्म्ये पैजवनोपाख्याने पार्वत्येन्द्रादीनां शापप्रदानवृत्तान्तवर्णनंनाम षट्चत्वारिंशदुत्तरशततमोऽध्यायः ॥२४६॥ N/A References : N/A Last Updated : January 06, 2025 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. 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