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श्रीबालाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् १ श्रीबालात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् २ श्रीबालाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ३ श्रीबालाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ४ श्रीबालाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ५ बिल्वाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीबुधाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीभद्रकाल्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीभुवनेश्वर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीभुवनेश्वर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीभुवनेश्वर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीभैरव्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् भैरव्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् मन्त्रसिद्धिप्रदमहादुर्गाशतनामस्तोत्रम् श्रीमहाकालककाराद्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् महाचक्रवर्तिनामाष्टोत्तरशतस्तोत्रम् महात्रिपुरसुन्दर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् माणिक्यवाचकाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीमातङ्गीशतनामस्तोत्रम् मातङ्ग्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीरङ्गनाथाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीराघवेन्द्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीराधाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीराधिकाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् रामनामाष्टोत्तरशतरामायणम् रामानुजाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीरामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीरामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् 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श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् हनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रनामावलिः श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहयग्रीवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीहरिहरपुत्राष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् हरिहराष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् देवी देवता कवच शारीरिक आणि मानसिक सुरक्षा देते, नकारात्मक शक्ती आणि संकटांपासून वाचवते. Tags : ashtottar shatnam stotradevidevtasanskritstotraसंस्कृतस्तोत्र श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् Translation - भाषांतर एतत्स्तोत्रं महालक्ष्मीर्महेशना इत्यारब्धस्यसहस्रनामस्तोत्रस्याङ्गभूतम् ।ब्रह्मजा ब्रह्मसुखदा ब्रह्मण्या ब्रह्मरूपिणी ।सुमतिः सुभगा सुन्दा प्रयतिर्नियतिर्यतिः ॥१॥सर्वप्राणस्वरूपा च सर्वेन्द्रियसुखप्रदा ।संविन्मयी सदाचारा सदातुष्टा सदानता ॥२॥कौमुदी कुमुदानन्दा कुः कुत्सिततमोहरी ।हृदयार्तिहरी हारशोभिनी हानिवारिणी ॥३॥सम्भाज्या संविभज्याऽऽज्ञा ज्यायसी जनिहारिणी ।महाक्रोधा महातर्षा महर्षिजनसेविता ॥४॥कैटभारिप्रिया कीर्तिः कीर्तिता कैतवोज्झिता ।कौमुदी शीतलमनाः कौसल्यासुतभामिनी ॥५॥कासारनाभिः का सा याऽऽप्येषेयत्ताविवर्जिता ।अन्तिकस्थाऽतिदूरस्था हृदयस्थाऽम्बुजस्थिता ॥६॥मुनिचित्तस्थिता मौनिगम्या मान्धातृपूजिता ।मतिस्थिरीकर्तृकार्यनित्यनिर्वहणोत्सुका ॥७॥महीस्थिता च मध्यस्था द्युस्थिताऽधःस्थितोर्ध्वग ।भूतिर्विभूतिः सुरभिः सुरसिद्धार्तिहारिणी ॥८॥अतिभोगाऽतिदानाऽतिरूपाऽतिकरुणाऽतिभाः ।विज्वरा वियदाभोगा वितन्द्रा विरहासहा ॥९॥शूर्पकारातिजननी शून्यदोषा शुचिप्रिया ।निःस्पृहा सस्पृहा नीलासपत्नी निधिदायिनी ॥१०॥कुम्भस्तनी कुन्दरदा कुङ्कुमालेपिता कुजा ।शास्त्रज्ञा शास्त्रजननी शास्त्रज्ञेया शरीरगा ॥११॥सत्यभास्सत्यसङ्कल्पा सत्यकामा सरोजिनी ।चन्द्रप्रिया चन्द्रगता चन्द्रा चन्द्रसहोदरी ॥१२॥औदर्यौपयिकी प्रीता गीता चौता गिरिस्थिता ।अनन्विताऽप्यमूलार्तिध्वान्तपुञ्जरविप्रभा ॥१३॥मङ्गला मङ्गलपरा मृग्या मङ्गलदेवता ।कोमला च महालक्ष्मीः नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।फलश्रुतिःनारद उवाच-इत्येवं नामसाहस्रं साष्टोत्तरशतं श्रियः ।कथितं ते महाराज भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१॥भूतानामवताराणां तथा विष्णोर्भविष्यताम् ।लक्ष्म्या नित्यानुगामिन्याः गुणकर्मानुसारतः ॥२॥उदाहृतानि नामानि सारभूतानि सर्वतः ।इदन्तु नामसाहस्रं ब्रह्मणा कथितं मम ॥३॥उपांशुवाचिकजपैः प्रीयेतास्य हरिप्रिया ।लक्ष्मीनामसहस्रेण श्रुतेन पठितेन वा ॥४॥धर्मार्थी धर्मलाभी स्यात् अर्थार्थी चार्थवान् भवेत् ।कामार्थी लभते कामान् सुखार्थी लभते सुखम् ॥५॥इहामुत्र च सौख्याय लक्ष्मीभक्तिहितङ्करी ।इदं श्रीनामसाहस्रं रहस्यानां रहस्यकम् ॥६॥गोप्यं त्वया प्रयत्नेन अपचारभयाच्छ्रियः ।नैतद्व्रात्याय वक्तव्यं न मूर्खाय न दम्भिने ॥७॥न नास्तिकाय नो वेदशास्त्रविक्रयकारिणे ।वक्तव्यं भक्तियुक्ताय दरिद्राय च सीदते ॥८॥सकृत्पठित्व श्रीदेव्याः नामसाहस्रमुत्तमम् ।दारिद्र्यान्मुच्यते पुर्वं जन्मकोटिभवान्नरः ॥९॥त्रिवारपठनादस्याः सर्वपापक्षयो भवेत् ।पञ्चचत्वारिंशदहं सायं प्रातः पठेत्तु यः ॥१०॥तस्य सन्निहिता लक्ष्मीः किमतोऽधिकमाप्यते ।अमायां पौर्णमास्यां च भृगुवारेषु सङ्क्रमे ॥११॥प्रातः स्नात्वा नित्यकर्म यथाविधि समाप्य चस्वर्णपात्रेऽथ रजते कांस्यपात्रेऽथवा द्विजः ॥१२॥निक्षिप्य कुङ्कुमं तत्र लिखित्वाऽष्टदलाम्बुजम् ।कर्णिकामध्यतो लक्ष्मीं बीजं साधु विलिख्य च ॥१३॥प्रागादिषु दलेष्वस्य वाणीब्राह्म्यादिमातृकाः ।विलिख्य वर्णतोऽथेदं नामसाहस्रमादरात् ॥१४॥यः पठेत् तस्य लोकस्तु सर्वेऽपि वशगास्ततः ।राज्यलाभः पुत्रपौत्रलाभः शत्रुजयस्तथा ॥१५॥सङ्कल्पादेव तस्य स्यात् नात्र कार्या विचारणा ।अनेन नामसहस्रेणार्चयेत् कमलां यदि ॥१६॥कुङ्कुमेनाथ पुष्पैर्वा न तस्य स्यात्पराभवः ।उत्तमोत्तमता प्रोक्ता कमलानामिहार्चने ॥१७॥तदभावे कुङ्कुमं स्यात् मल्लीपुष्पाञ्जलिस्ततः ।जातीपुष्पाणि च ततः ततो मरुवकावलिः ॥१८॥पद्मानामेव रक्तत्वं श्लाघितं मुनिसत्तमैः ।अन्येषां कुसुमानान्तु शौक्ल्यमेव शिवार्चने ॥१९॥प्रशस्तं नृपतिश्रेष्ठ तस्माद्यत्नपरो भवेत् ।किमिहात्र बहूक्तेन लक्ष्मीनामसहस्रकम् ॥२०॥वेदानां सरहस्यानां सर्वशास्त्रगिरामपि ।तन्त्राणामपि सर्वेषां सारभूतं न संशयः ॥२१॥सर्वपापक्षयकरं सर्वशत्रुविनाशनम् ।दारिद्र्यध्वंसनकरं पराभवनिवर्तकम् ॥२२॥विश्लिष्टबन्धुसंश्लेषकारकं सद्गतिप्रदम् ।तन्वन्ते चिन्मयात्म्यैक्यबोधादानन्ददायकम् ॥२३॥लक्ष्मीनामसहस्रं तत् नरोऽवश्यं पठेत्सदा ।योऽसौ तात्पर्यतः पाठी सर्वज्ञः सुखितो भवेत् ॥२४॥अकारादिक्षकारान्तनामभिः पूजयेत्सुधीः ।तस्य सर्वेप्सितार्थसिद्धिर्भवति निश्चितम् ॥२५॥श्रियं वर्चसमारोग्यं शोभनं धान्यसम्पदः ।पशूनां बहुपुत्राणां लाभश्च सम्भावेद्ध्रुवम् ॥२६॥शतसंवत्सरं विंशत्युतरं जीवितं भवेत् ।मङ्गलानि तनोत्येषा श्रीविद्यामङ्गला शुभा ॥२७॥इति नारदीयोपपुराणान्तर्गतं श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् । N/A References : N/A Last Updated : December 26, 2025 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. 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