सुखमनी साहिब - अष्टपदी १६

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


( गुरु ग्रंथ साहिब - पान २८३ )

श्लोक

रुपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ।
तिसहि बुझाए नानका जिसु होवै सुप्रसंन्न ॥१॥

पद १ ले

अबिनासी प्रभु मन महि राखु ।
मानुख की तू प्रीति तिआगु ॥
तिस ते परै नाही किछु कोइ ।
सरब निरंतरि एको सोइ ॥
आपे बीना आपे दाना ।
गहिर गंभीरु गहीरु सुजाना ॥
पारब्रम्ह परमेसुर गोबिंद ।
क्रिपा निधान दइआल बखसंद ।
साध तेरे की चरनी पाउ ॥
नानक कै मनि इहु अनराउ ॥१॥

पद २ रे

मनसा पूरन सरना जोग ।
जो करि पाइआ सोई होगु ॥
हरन भरन जा का नेत्र फोरु ।
तिस का मंत्रु न जानै होरु ॥
अनद रुप मंगल सदा जा कै ।
सरब थोक सुनीअहि घरि ता कै ॥
राज महि राजु जोग महि जोगी ।
तप महि तपीसरु ग्रिहसत महि भोगी ॥
धिआइ धिआइ भगतह सुखु पाइआ ।
नानक तिसु पुरख का किनै अंतु न पाइआ ॥२॥

पद ३ रे

जा की लीला की मिति नाहि ।
सगल देव हारे अवगाहि ॥
पिता का जनमु कि जानै पूतु ।
सगल परोई अपुनै सूति ॥
सुमति गिआनु धिआनु जिन देइ ।
जन दास नामु धिआवहि सेइ ॥
तिहु गुण महि जा कउ भरमाए ।
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
ऊच नीच तिस के असथान ।
जैसा जनावै तैसा नानक जान ॥३॥

पद ४ थे

नाना रुप नाना जा के रंग ।
नाना भेख करहि इक रंग ॥
नाना बिधि कीनो बिसथारु ।
प्रभु अबिनासी एकंकारु ॥
नाना चलित करे खिन माहि ।
पूरि रहिओ पूरनु सभ ठाइ ॥
नाना बिधि करि बनत बनाई ।
अपनी कीमति आपे पाई ॥
सभ घट तिस के सभ तिस के ठाउ ।
जपि जपि जीवै नानक हरि नाउ ॥४॥

पद ५ वे

नाम के धारे सगले जतं ॥
नाम के धारे खंड ब्रहमंड ॥
नाम के धारे सिम्रिति बेद पुरान ।
नाम के धारे सुनन गिआन धिआन ॥
नाम के धारे आगास पाताल ।
नाम के धारे सगल आकार ॥
नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ।
नाम कै संगि उधरे सुनि स्रवन ॥
करि किरपा जिसु आपनै नामि लाए ।
नानक चउथे पद महि सो जनु गति पाए ॥५॥

पद ६ वे

रुपु सति जा का सति असथानु ।
पुरखु सति केवल परधानु ॥
करतूति सति सति जा की बाणी ।
सति पुरख सभ माहि समाणी ॥
सति करमु जा की रचना सति ।
मूलु सति सति उतपति ॥
सति करणी निरमल निरमली ।
जिसहि बुझाए तिसहि सभ भली ॥
सति नामु प्रभ का सुखदाई ।
बिस्वासु सति नानक गुर ते पाई ॥६॥

पद ७ वे

सति बचन साधू उपदे स ।
सति ते जन जा कै रिदै प्रवेस ॥
सति निरति बूझै जे कोइ ।
नामु जपत ता की गति होइ ॥
आपि सति कीआ सभु सति ।
आपे जानै अपनी मिति गति ॥
जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ।
अवर न बुझि करत बीचारु ॥
करते की मिति न जानै कीआ ।
नानक जो तिसु भावै सो वरतीआ ॥७॥

पद ८ वे

बिसमन बिसम भए बिसमाद ।
जिनि बूझिआ तिसु आइआ स्वाद ॥
प्रभ कै रंगि राचि जन रहे ।
गुर कै बचनि पदारथ लहे ॥
ओइ दाते दुख काटनहार ।
जा कै संगि तरै संसार ॥
जन का सेवकु सो वडभागी ।
जन कै संगि एक लिव लागी ॥
गुन गोबिंद लीरतनु जनु गावै ।
गुर प्रसादि नानक फलु पावै ॥८॥

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Last Updated : December 28, 2013

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