हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|पुस्तक|हिन्दी पदावली| पद ७१ से ८० हिन्दी पदावली पद १ से १० पद ११ से २० पद २१ से ३० पद ३१ से ४० पद ४१ से ५० पद ५१ से ६० पद ६१ से ७० पद ७१ से ८० पद ८१ से ९० पद ९१ से १०० पद १०१ से ११० पद १११ से १२० पद १२१ से १३० पद १३१ से १४० पद १४१ से १५० पद १५१ से १६० पद १६१ से १७० पद १७१ से १८० पद १८१ से १९० पद १९१ से २०० पद २०१ से २१० पद २११ से २२० पद २२१ से २२९ हिन्दी पदावली - पद ७१ से ८० संत नामदेवजी मराठी संत होते हुए भी, उन्होंने हिन्दी भाषामें सरल अभंग रचना की । Tags : abhangbooknamdevअभंगनामदेवपुस्तक पद ७१ से ८० Translation - भाषांतर ७१जहां तहां मिल्यौ सोई । ताथैं कहै सुनै सब कोई ॥टेक॥अभेदै अभेद मिल्यौ । भेदै मिल्यौ भेदू ।सहज सोई सहज मिल्यौ । षेले मिल्यौ षेलू ॥१॥दुष सोई दुषै मिल्या । सुषै सुष समानां ।ग्यान सोई ग्याने मिल्यौ । ध्यानै मिल्यौ ध्याना ॥२॥देष्यौ कहूं तौ निफ्ट झूठा । सुनी कहू तो झूठारे ।नामदेव कहै जे अगम भण । तौ पूछया ही अण पूछया रे ॥३॥७२बीठला भंवरा कंवल न पावै । ताथै जन्म जन्म डहकावै ॥टेक॥दादुर ऐक बसै पडवणि तलि । स्वाद कुस्वाद न पावै ।पहुप बास का लुबधी भौंरा । सौ जोजन फिरि आवै ॥१॥महणारंभ होत घट भीतरि । रवि ससी नेत बिलौवै ।वो हालै वो ठौर न पावै । ताथैं भौंरा जुगि जुगि रोवै ॥२॥उपजी भगति पचीसूं परिहरि । बहोरि जन्म नहीं आवै ।अषंड मंडल निराकार मैं । दास नांमदेव गावै ॥३॥७३रे मन पंछीया न परसि पिंजरै । संसार माया जाल रे ।येक दिन मैं तीन फेरा । तोहि सदा झंपै काल रे ॥टेक॥धन जोबन रुप देषि करि । गरव्यो कहा गंवार रे ।कुंभ कांचौ नीर भरीयो । बिनसतां नहीं बार रे ॥१॥अमी कुंदन कपूर भोजन । नित नवा सिंगार रे ।हंस कावडि छाडि चाल्यौ । देह ह्रैहै छार रे ॥२॥ते पिता जननी आहि ल्यछमी । पूत सब परिवार रे ।अंति ऊभा मेल्हि करि । ऐकलो जाइ नहीं लार रे ॥३॥बरस लगि तेरी माइ रोवै । बहनडी छह मास रे ।अस्त्री रोवै दस देहाडा । चित वंती घर बास रे ॥४॥भनत नांमदेव सुनूं हो तिलोचन । घटिदया ध्रम पालि रे ।पाहुनां दिनच्यारि केरा । सुकृत राम संभारि रे ॥५॥राग गौडी७४अदबुद अचंभा कथ्या न जाई । चींटी के नेत्र कैसे गजिंद्र समाई ॥टेक॥कोई बोलै नेरे कोई बोलै दूरि । जल की मछली कैसे चढै षजूरि ॥१॥कोई बोलै इंद्री बांध्या कोई बोलै मुक्ता । सहजि समाधि न चीन्हे मुगधा ॥२॥कोई बोलै बेद सुमृत पुरांना । सतगुरु कथीया पद निरवानां ॥३॥कहै नांमदेव परम तत है ऐसा। जाकै रुप न रेष वरण कहौ कैसा ॥४॥७५देवा आज गुडी सहज उडी । गगन मांहि समाई ।बोलन हारा डोरि समांनां । नहीं आवै नहीं जाई ॥टेक॥तीन रंग डोरि जाके । सेत पीत स्याही ।छांडि गगन वाजि पवन । सुर नर मुनि चाही ॥१॥द्वादसतैं उपजी गुडी । जानै जन कोई ।मनसा कौ दरस परस । गुरु थैं गम होई ।२॥कागद थैं रहित गुडी । सहज आनंद होई ।नांमदेव जल मेघ बूंद । मिलि रह्या ज्यूं सोई ॥३॥७६काहे रे मन भूला फिरई । चेति न राम चरन चित धरही ॥टेक॥नरहरि नरहरि जपिरे जीयरा । अवधि काल दिन आवै नियरा ॥१॥पुत्र कलित्र धन चित बेसासा । छाडि मनारे झूठी आसा ॥२॥तू जिनि जानै ग्रेही ग्रेहा । बिनसत बार कछू नहीं देहा ॥३॥कहत नांमदेव झूठी देही । तौ सांची जे राम सनेही ॥४॥७७राम नांमै बोलि नृवाण वाणी । जिभ्या आंन मिथ्या करि जाणी ॥टेक॥को को न सारे को को न उधारे । बैकुंठ नाथ षसम हमारे ॥१॥सोना की मालि पाषाण बेधिला । झींझ फूटी रामनांम अकेला ॥२॥सपत पुरी नौ उषर भाई । रांम बिना कौने गति पाई ॥३॥माटी देषि माटी कहा भुलाना । कहि समझावै दास नामा ॥४॥७८मेरी कौन गति गुसाई तुम जगत भरन दिवा ।जन्म हीन करम छीन भूलि गयौ सेवा ॥टेक॥बडौ पतित पतितन मैं । गज गनिका गामी ।और पतित जगत प्रकट । तिनहूं मैं नांमी ॥१॥तुम दयाल मैं गरीब । टेरि कहौं रामा ।दीन जानि बिनती मानि । गावै दास नामा ॥२॥७९ऐवडी सीमौंनै बुधि आवडी । नाम न बिसरुं एकौ घडी ॥टेक॥हरि हरि कहतां जे नर लाजै । जमस्की डांग तिनै सिरि बाजै ॥१॥हरि हरि कहतां न कीजै बांतां । गयौ पाप जे पोतै हुता ॥२॥नामदेव कहै मैं हरि हरि मनौं । कहै पाप अरु लाभ होई घनौ ॥३॥८०ऐसे जगथैं दास नियारा ।वेद पुरांन सुमृत किन देषौ पंडित करउ बिचारा ॥टेक॥दधि बिलाइ जैसे घृत लीजे । बहुरि न ऐकठ थाई ॥पावक दार जतन करि काढ्या, बहुरि न दार समाई ॥१॥पारस परसि लोह जैसे कंचन, बहुरि न त्र्यंबक होई ।आक पलास बेधीया चंदन, कास्ट कहै नहीं कोई ॥२॥जे जन राम नाम रंगि राता, छाडि करम की आसा ।ते जन रामै राम समानै, प्रणवत नामदेव दासा ॥३॥ N/A References : N/A Last Updated : January 02, 2015 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. Like us on Facebook to send us a private message. TOP