कामाख्या स्तुतिः - एकादशः पटलः

कामरूप कामाख्या में जो देवी का सिद्ध पीठ है वह इसी सृष्टीकर्ती त्रिपुरसुंदरी का है ।


कामाख्या - पीठ - स्थान - वर्णनम्

नेपालं च महा - पीठं, पौगण्ड - वर्द्धमानाथ ।
पुर - स्थिरं महा - पीठं, चर - स्थिरमतः परम् ॥१॥
काश्मीरं च तथा पीठं, कान्यकुब्जमथ भवेत् ।
दारुकेशं महा - पीठमेकाम्रं च तथा शिवे ! ॥२॥
त्रिस्रोत - पीठमुद्दिष्टं, काम - कोटमतः परम् ।
कैलासं भृगु - नगं च, केदारं पीठमुत्तमम् ॥३॥
श्री - पीठं च तथोङ्कारं, जालन्धरमतः परम् ।
मालवं च कुलाब्जं च, देव - मातृकामेव च ॥४॥
गोकर्णं च तथा पीठं, मारुतेश्वरमेव च ।
अष्टहासं च वीरजं, राज - गृहमतः परम् ॥५॥
पीठं कोल - गिरिश्चैव, एला - पुरमतः परम् ।
कालेश्वरं महा - पीठं, प्रणवं च जयन्तिका ॥६॥
पीठमुज्जयिनीं चैव, क्षीरिका - पीठमेव च ।
हस्तिनापूरकं पीठं, पीठमुड्डीशमेव च ॥७॥
प्रयागं च हि षष्ठीशं, मायापुरं कुलेश्वरी ।
मलयं च महा - पीठं, श्रीशैलं च तथा प्रिये ! ॥८॥
मेरु - गिरिं महेन्द्रं च, वामनं च महेश्वरि ! ।
हिरण्य - पूरकं पीठं, महा - लक्ष्मी - पुरं तथा ॥९॥
उड्डीयानं महा - पीठं, काशी - पुरमतः परम् ।
पीठान्येतानि देवेशि ! अनन्त - फल - दायिनी ॥१०॥
यत्रास्ति कालिका - मूर्तिर्निर्जन - स्थान - कानने ।
विल्व - वनादि - कान्तारे, तत्रास्थायाष्टमी - दिने ॥११॥
कृष्ण - पक्षे चतुर्दश्यां, शनि - भौम - दिब्ने तथा ।
महा - निशाया देवेशि ! तत्र सिद्धिरनुत्तमा ॥१२॥
अन्यान्यपि च पीठान्ति, तत्र सन्ति न संशयः ।
देव - दानव - गन्धर्वाः, किन्नराः प्रमथादयः ॥१३॥
यक्षाद्या नायिका सर्वा, किन्नर्यश्च देवाङ्गनाः ।
अचर्यन्त्यत्र देवेशीं, पञ्चतत्त्वादिभिः पराम् ॥१४॥
वाराणस्यां सदा पूज्या, शीघ्रं तु फलदायिनी ।
ततस्तु द्विगुणा प्रोक्ता, पुरुषोत्तम - सन्निधो ॥१५॥
ततो हि द्विगुणा प्रोक्ता, द्वारावत्यां विशेषतः ।
नास्ति क्षेत्रेषु तीर्थेषु, पूजा द्वारावती - समा ॥१६॥
विन्ध्येऽपि षडगुणाप्रोक्ता, गङ्गायामपि तत् - समा ।
आर्यावर्ते मध्य - देशे, ब्रह्मावर्ते तथैव च ॥१७॥
विध्यवत् फलदा प्रोक्ता, प्रयागे पुष्करे तथा ।
एतच्च द्विगुणोक्तं प्रोक्तं, करतोया - नदी - जले ॥१८॥
ततश्चतुर्गुणं प्रोक्तं, नन्दी - कुण्डे च भैरवे ।
एतच्चतुर्गुणं प्रोक्तं वल्मीकेश्वर - सन्निधौ ॥१९॥
यत्र सिद्धेश्वरी योनौ, ततोऽपि द्विगुणा स्मृता ।
ततश्चतुर्गुणा प्रोक्ता लौहित्य - नद - पयसि ॥२०॥
तत् - समा काम - रुपे, सर्वत्रैव जले स्थले ।
देवी - पूजा तथा शस्ता, काम - रुपे सुरालये ॥२१॥
देवी - क्षेत्रे काम - रुपं, विद्यते नहि तत् - समम् ।
सर्वत्र विद्यते देवी, काम - रुपे गृहे गृहे ॥२२॥
ततश्चतुर्गुणं प्रोक्तं, कामाख्या - योनि - मण्डलम् ।
कामाक्यायां महा - माया, सदा तिष्ठति निश्चितम् ॥२३॥
एषु स्थानेषु देवेशि ! यदि दैवात् गतिर्भवेत् ।
जप - पूजादिकं कृत्वा, नत्वा गच्छेत् यथा - सुखम् ॥२४॥
स्त्री - समीपे कृपा पूजा, जपश्चैव वरानने ! ।
काम - रुपाच्छत - गुणं, फलं हि समुदीरितम् ॥२५॥
अतएव महेशानि ! संहतिर्योषितां प्रिये ! ।
गृहीत्वा रक्त - वसनां, दुष्टां तु वर्जेत् भक्तिमान् ॥२६॥
एक - नित्यादि - पीठे वा, श्मशने वर - वर्णिनी ! ।
स्त्री - रुपे हि सदा सन्ति, पीठेऽन्यत्रापि चा प्रिये ! ॥२७॥
स्त्रयङ्गेषु च महामाया, जागर्ति सततं शिवे ! ।
देह - पीठं, प्रत्यक्षं दिव्य - रुपिणी ॥२८॥
भ्रान्त्याऽन्यत्र भ्रमन्ति ये, देशे देशे च मानवः ।
पशवस्ते .............. यथानघे ! ॥२९॥
काली - मूर्तिर्यत्र निर्जने, विपिने कान्तारे वापि ।
कृष्णाऽष्टमी - निशा - भागे, कालीं सम्पूज्य पञ्चमे ॥३०॥
गुटिका - खङ्ग - सिद्धिं च, खेचरी - सिद्धिमेव च ।
यक्ष - गन्धर्व - नागानां, नायिकानां महेश्वरी ! ॥३१॥
भूत - वेताल - देवानां, कन्यानां सिद्धिमेव च ।
जायते परमेशानि ! किं पुनः कथयामि ते ! ॥३२॥
पञ्चतत्त्व - विहीनानां, सर्वं निष्फलतां व्रजेत् ॥३३॥

॥ कामाख्या - तन्त्रे शिव पार्वती - सम्वादे एकादशः पटलः ॥

Translation - भाषांतर
हे देवेशि ! अनन्त फल देनेवाले महापीठ ये हैं - १. नेपाल, २. पौगण्ड, ३. वर्द्धमान, ४. पुर - स्थिर, ५. चर - स्थिर, ६. काश्मीर, ७. कान्यकुब्ज, ८. दारुकेश और ९ एकाम्र । इनके बार अत्यन्त उत्कृष्ट पीठ हैं - १. त्रि - स्रोत ( त्रिवेणी - संगम ), २. कामकोट, ३. कैलाश पर्वत, ४. भृगु पर्वत और ५. केदार । अन्य पीठ ये हैं - १. ॐ कार, २. जालन्धर, ३. मालव, ४. कुलाब्ज, ५. देव - मातृका, ६. गोकर्ण, ७. मारुतेश्वर, ८. अष्टहास, ९. वीरज, १०. राजगृह । पुनः महापीठ ये हैं - १. कोलगिरि, २. एलापुर, ३. कोलेश्वर प्रणव और ४. जयन्तिका । इनके अतिरिक्त पीठ ये हैं - १. उज्जयिनी, २. क्षीरिका, ३. हस्तिनापुर और ४. उड्डीश । पुनः महापीठ ये है - १. प्रयाग, २. षष्ठीश, ३. मायापुर, ४. कुलेश्वरी ( जनेश्वरी ), ५. मलय पर्वत, ६. श्रीशैल पर्वत, ७. मेरु पर्वत, ८. महेन्द्र पर्वत, ९. वामन पर्वत, १०. हिरण्यपुर, ११. महालक्ष्मीपुर और १२. उड्डीयान । इन सभी पीठस्थानों में साधना अनन्त फल देती हैं ।
हे देवेशि ! यदि किसी निर्जन स्थान में, वन के बीच या किसी बिल्वादिवन में या किसी दुर्गम घने वन के बीच काली की कोई मूर्ति हो, तो ऐसे किसी स्थान में बैठकर शनिवार या मंगलवारयुक्त कृष्णाऽष्टमी या कृष्णा चतुर्दशी तिथि में महानिशाकाल में कालिका देवी की साधना करने से अति उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ।
अन्य भी पीठ संसार में हैं, इसमें सन्देह नहीं । वहाँ देव - दानव - गन्धर्व, किन्नर, प्रमथ, यक्ष, सभी नायिकाएँ, किन्नरियाँ और देव - स्त्रियाँ पंचतत्त्वों आदि से परा देवी की पूजा करती हैं ।
वाराणसी में देवी कामाख्या सदा पूजनीया हैं, शीघ्र ही फल देती हैं । उससे दूना फल पुरुषोत्तम तीर्थ में मिलता है । विशेष कर द्वारावती में उससे भी दूना फल मिलता है । द्वारावती के समान फलदायिनी पूजा अन्य किसी क्षेत्र, तीर्थ में नहीं होती ।
विन्ध्याचल और गंगा किनारे पूजा करने से छः गुना फल होता है और आर्यावर्त, मध्य - देश एवं ब्रह्मावर्त में भी वैसा ही फल मिलता है । प्रयाग और पुष्कर विन्ध्याचल के समान ही फलप्रद हैं । करतोया नदी के जल - मध्य में उसका दूना फल मिलता है ।
नदी - कुण्ड और भैरव - कुण्ड में पूजा का चौगुना फल होता है । उससे चौगुना फल वल्मीकेश्वर के निकट मिलता है । जहाँ सिद्धेश्वरी योनि विद्यमान है, वहाँ दुगुना फल होता है । उससे चौगुना फल लोहित नद के जल में बताया गया है ।
काम - रुप में जल और स्थल सभी स्थानों में की गई पूजा का फल वैसा ही होता है । काम - रुप और देवालय में महाशक्ति की पूजा प्रशस्त है । देवी - क्षेत्र में काम - रुप विद्यमान रहता है९, उसके समान कुछ भी नहीं है । इस प्रकार देवी काम - रुप में घर - घर में विराजमाना हैं ।
कामाख्या - योनि - मण्डल चौगुना फलदायक है । कामाख्या में महामाया सदैव निश्चित रुप से विद्यमान रहती हैं ।
हे देवेशि ! उक्त स्थान में यदि दैवयोग से पहुँच जाए, तो जप - पूजा आदि करके देवी को प्रणाम कर सहर्ष अभीष्ट स्थान को जाना चाहिए ।
हे वरानने ! स्त्री के पास की गई पूजा और जप का फल ' काम - रुप ' के प्रभाव से सौ गुना अधिक होता है । अतः हे महेशानि ! रक्तवस्त्रा स्त्रियों का सहयोग लेना चाहिए । दुष्ट स्वभाववाली स्त्रियों से भक्त साधकों को दूर रहना चाहिए ।
हे प्रिय सुन्दरी ! एक नित्या आदि पीठ में या श्मशान में या अन्य पीठों में भी स्त्री - रुप में देवी सदैव विराजमान रहती हैं । हे शिवे ! स्त्री के अंगों में महामाया निरन्तर जाग्रत रहती हैं । देहपीठ ही महापीठ है, वहाँ देवीरुप प्रत्यक्ष दिखाई देता है ।
भ्रान्तिवश जो मनुष्य देश - देश में भटकते फिरते हैं, हे पवित्रे ! वे पशु के समान ही हैं ।
निर्जन स्थान में, वन या घने जंगल में, जहाँ भी काली की मूर्ति स्थापित हो, वहाँ कृष्णाऽष्टमी के रात्रिकाल में पंचतत्त्वों से काली की पूजा करें, तो गुटिका - सिद्धि, खेचरी - सिद्धि, यक्ष - गन्धर्व - नाग - भूत - वेताल - देवों की नायिकाओं और कन्याओं की सिद्धि प्राप्त होती है । हे परमेश्वरी ! इससे अधिक क्या कहूँ । हाँ, पंचतत्त्वों से विहीन लोगों के सभी कर्म निष्फल होते हैं ।

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Last Updated : 2009-07-10T22:55:10.9230000