हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|भजन|यारी साहब|
गुरुके चरनकी रज लैके , दो...

भजन - गुरुके चरनकी रज लैके , दो...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


गुरुके चरनकी रज लैके, दोउ नैननके बिन अंजन दीया ।

तिमिर मेटि उँजियार हुआ, निरंकार पियाको देख लीया ॥

कोटि सूरज तहँ छिपे घने, तीन लोक-धनी धन पाइ पीया ।

सतगुरुने जो करी किरपा, मरिके 'यारी' जुग-जुग जीया ॥

N/A

References : N/A
Last Updated : December 25, 2007

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP