अभिलाषा - और आसरो छोड़ , आसरो ले ...

’अभिलाषा’के अंतर्गत भगवत्प्रेमी संतोंकी सुमधुर कल्याणमयी कामनाओंका दिग्दर्शन करानेवाले पदोंकी छटा भाव-दृष्टिके सामने आती है ।


अभिलाषा

और आसरो छोड़, आसरो ले लियो कुँअर-कन्हाईको ।

हे बनवारी ! आज माहेरो भरजा नानीबाईको ॥टेर॥

असुर-संहारन भक्त-उधारन चार वेद महिमा गाई ।

जहँ-जँह भीर पड़ी भक्तन पै तहँ-तँह आप करी सहाई ।

पृथ्वी लाकर सृष्टि रचाई बराह होय सतयुग माँही ।

असुर मार प्रह्लाद उबार् यो प्रगट भये खम्भे माँही ।

बावन होय बलीको छल लियो कीन्हों काम ठगाईको ॥१॥

मच्छ-कच्छ अवतार धारकर सुर-नरकी मनसा पूरी ।

अर्ध रैन गजराज पुकार् यो गरुड़ छोड़ पहुँचे दूरी ।

भस्मासुरको भस्म करायो सुन्दर रुप बने हरी ।

नारदकी नारी ठग लीन्हीं जाकर आप चढ़े चूँरी ।

असुरनसे अमृत लै लीन्हों बनकर भेष लुगाईको ॥२॥

परशुराम श्रीरामचन्द्र भये गौतमकी नारी तारी ।

भिलनीके फल मीठे खाये शंका त्याग दई सारी ।

करमाके घर खीचड़ खायो तारि अधम गणिका नारी ।

छलकर तर गई नारि पूतना कुबजा भई आज्ञाकारी ।

सेन भगतका साँसा मेट्या रुप बनाकर नाईको ॥३॥

नामदेव रैदास कबीरो धन्ना भगतको खेत भर् यो ।

दुर्योधनका मेवा त्यागा साग बिदुर-घर पाज कर् यो ।

प्रीत लगाकर गोपी तर गई मीराजीको काज सर् यो ।

चीर बढ़ायो द्रुपद-सुताको दु:शासनको मान हर् यो ।

कहे नरसीलो सुन साँवरिया करले काम भलाईको ॥४॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2014-01-22T14:51:14.4570000