हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|पुस्तक|ठाकुर प्रसाद| नवम स्कन्ध ठाकुर प्रसाद भागवत का उद्देश्य प्रथम स्कन्ध सूची द्वितीय स्कन्ध सूची तृतीय स्कन्ध सूची चतुर्थ स्कन्ध सूची पञ्चम स्कन्ध सूची षष्ठ स्कन्ध सूची सप्तम स्कन्ध सूची अष्टम स्कन्ध सूची नवम स्कन्ध सूची दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) एकादश स्कन्ध सूची द्वादश स्कन्ध सूची प्रथम स्कन्ध द्वितीय स्कन्ध तृतीय स्कन्ध चतुर्थ स्कन्ध पञ्चम स्कन्ध षष्ठ स्कन्ध सप्तम स्कन्ध अष्टम स्कन्ध नवम स्कन्ध दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) एकादश स्कन्ध द्वादश स्कन्ध ठाकुर प्रसाद - नवम स्कन्ध ठाकुर प्रसाद म्हणजे समाजाला केलेला उपदेश. Tags : bookthakur prasadठाकुर प्रसादहिन्दी नवम स्कन्ध Translation - भाषांतर ॐ जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेश्वभिज्ञ: स्वराट तेने व्रम्हा ह्रदय आदिकवये मुहयंति यत्सूरय: ।तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यक्ष त्रिसर्गोऽमृषा धाम्नां स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परम धीमहिश्रीकृष्णं वंदे जगदगुरुम् ।जगत गुरु श्रीशंकराचार्याय नम: ।तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष परमेश्वर ।अहं भक्तपराधीनो म्हास्वतंत्र इव द्विज ।साधुभिर्ग्रस्तह्रदयो भक्तैर्मत्कजनप्रिय: ॥भगवान् कहते हैं :---ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणत् वित्तमिमं परम् ।हिस्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे ॥मयि निर्बद्धह्रदया: साधव: समदर्शना: ।वशी कुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पति: यथा ॥भक्ता मुझे भक्ति से वश में कर लेते हैं ।साधवो ह्रदयं महयं साधून ह्रदयं त्वहम् ।नाम की महिमा भी बहुत बडी है :---नामलिया उन्होंने जान लिया सकल शास्त्र का भेद ।बिना नाम नरक में गया पढ - पढ चारों वेद ॥अंगं गलितं पलितं मुड दशनविहीनं जातं तुंडम् ।वृद्धो याति गृहित्वा दंडं तदपि न मुंचति आशा पिंडम् ।भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढमते ॥मुमुक्षु: मिथुनव्रतिनां संगं त्यजेत् ।स्त्रीणं स्त्रीसंगिनां संगं त्यजेत् ।जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहि ।तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी ।हरषित महतारी मुनिमन हारी अदभुत रूप विचारी ॥लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुजचारी ।भूषन वनमाला नयन विशाला शोभा सिन्धु खरारी ॥कह दुइ कर जोरी स्तुति तोरी केहि विधि करौं अनन्ता ।माया गुन ज्ञानातीत अमान अवेद पुरान भनन्ता ॥करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।सो मम हित लागी जन अनुरगी भयौ प्रकट श्रीकन्ता ॥दोहाविप्र धेनु सुर संत हित ली ह मनुज अवतार ।निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥सियावर रामचन्द्र की जय ।रघुपति रामचन्द्र की जय ॥अगुन अरूप अलख अज जोई ।भगत प्रेम - बस सगुण सो होई ॥बिनु पद चलै सुनै बिनु काना ।कर बिनु करम करै विधि नाना ॥आनन रहित सकल रस भोगी ।बिनु बानी वक्ता बड जोगी ॥तन बिनु परस नयन बिनु देखा ।ग्रहै घ्रान बिनु बास अशेषा ॥अति सब भाँति अलौकिक करनी ।महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धर्हिं मुनि ध्यान ।सोइ दशरथ सुत भगत हित कोशलपति भगवान ॥जानिय तबहिं जीव जग जागा ।जब सब विषय विलास विरागा ॥गीताजी में कहा गया हैं :---या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ॥तत्र वेदा अवेदा भवन्ति ।ऐसो को उदार जग माहीं ।बिन सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कौ नाहीं ॥जो गति योग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनिग्यानी ।सो गति देत गीध शबरी कहं, प्रभु न बहुत जिय जानी ॥तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो ।तौ भजु राम काम सब पूरन करहि कृपानिधि तेरो ॥श्मशानेश्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचा: सहचरा: ।चिताभस्मालेप: स्रगति नृकरोटीपरिकर: ॥अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवखिलं ।तथाऽपि स्मतृणां वरद परमं मंगलमसि ॥राम देत नहिं बनइ गुसाई ।देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं ।सौ मुनि देउं निमिष एक माहीं ॥मनोजवं मारुततुल्य वेगम् जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।वातात्मजं वानरयूथ मुख्यम् श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥अरुन नयन उर बाहु बिसाला ।नील जलज तनु श्याम तमाला ॥कटि पट पीत कसे वर भाथा ।रुचिर चाप सायक दुहुं हाथा ॥द्वारिका में द्वारिकानाथ खडे हैं ।डाकोर में रणछोड रायजी खडे हैं ।स्रीनाथजी में गोवर्धननाथ खडे हैं ।पंढरपुर में विट्ठलनाथजी खडे हैं ।धनुष, ज्ञान का स्वरूप है ।बाण, विवेक - स्वरूप है ।इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।जनक कहते हैं :---सहज विरागरूप मन मोरा ।थकित होत जिमि चन्द्र चकोरा ॥कर्मणैवहि संसिद्धिम् स्थिता जनकाद्य: ।जय जय गिरवर राजकिशोरी ।जय महेश मुखचंद चकोरी ॥देवि पूजि पदकमल तुम्हारे।सुर नर मुनि सब होंहिं सुखारे ॥‘सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ।’रामी राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।रामेणभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ॥रामानास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं ।रामे चित्तलय: सदा भवतु भे भो राम मामुद्धर ॥वधू लरिकनी पर घर आईं ।राखेहु नयन पलक की नाईं ॥रघुकुल रीति सदा चलि आई ।प्राण जायँ पर वचन न जाई ॥तापस वेष बिसेषि उदासी ।चौदह बरिस रामु बनबासी ॥जिऐ मीन बरु वारि बिहीना ।मनि बिनु फनिकु जिऐ दु:ख दीना ।कहुँ सुभाव न छल मन माहीं ।जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥कहि न जाई कछु ह्रदय विषादू ।बड भागी बन, अवध अमागी ।राखहु नयन पलक की नाईं ।की तनु पाण कि केवल प्राण ।पुत्रवती जुवती जग सोई ।रघुपति भगत जासु सुत होई ॥लक्ष्मण, मेरी अनुमति है ।अवध तहाँ जहँ राम निवासू ।अजहुँ न निकसे प्राण कठोर ।जिन चरननकी चरनपादुका भरत रहयो लौ लाई ।सोइ चरन केवट धोय लीन्हें तब हरि नाव चलाई ॥भज मन रामचरण सुखदायी ।जासु नाम सुमिरत एक बारा ।उतरहिं नर भवसिन्धु अपारा ॥ब्रम्हा जीव बिच माया जैसी ।मुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता सखा परम परमारथु एहू ।मन क्रम वचन राम पद नेहू ॥कौ न काहु सुख दु:ख कर दाता ।निज कृत करम भोग सबु भाता ॥सोइ जानै जेहि देहु जनाई ।जानत तुम्हहि तुम्है होइ जाई ॥में भी वास करेंगे ।जिनके श्रवण समुद्र समाना । कथ तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिनके हिय तुम कहं गृह रूरे ॥काम क्रोढ मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥जिनके कपट दंभ नहिं माया । तिनके ह्रदय बसहु रघुराया ॥सबके प्रिय सबके हितकारी । दु:ख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥कहहिं सत्य प्रिय वचन विचारी । जागत सोबत सरन तुम्हारी ॥तुमहि छाँडि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिनके उर माँही ॥जननी सम जानहि परनारी । धनु पराव विष तें विष भारी ॥जे हरषांहे पर संपति देखी । दुअंखत होहिं पर विपति बिसेखी ॥जिन्हहिं राम तुम प्रान पियारे । तिन्हके मन सुभ सदन तुम्हारे ॥स्वामि सखा पितुमातु गुरु, जिन्हके सब तुम्ह तात ।तिन्हके मनमंदिर बसहु, सीय सहित दौ भ्रात ॥चित्रकूट के घाट पर भै संतनकी भीर ।तुलसिदास चंदन घिसें तिलक करैं रघुवीर ॥चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम ।तनु परहरि रघुबर विरह राउ गयौ सुरधाम ॥जोरि पानि वर मागौं एहू ।सीय राम पद सहज सनेहू ॥जग जपु राम, राम जपु जेही ।अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहहुँ निरबान ।अनम जनम रति रामप्द, यह बरदान न आन ॥मोहि लागी लगन हरि दर्शन की ।जनम जनम रति रामपद, यहि वरदान न आन ।कार्पण्यदोषोपहतहस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेता ।जाकर नाम मरत मुख आवा ।अधमौ मुकुत होइ श्रुति गावा ॥सो मम लोचन गोचर प्रागे ।राखहुँ देह नाथ केहि खांगें ॥सुनहु उमा ते लोग अभागी ।हरि तजि होहिं विषय अनुरागी ॥रामनाम तो सब कहें, दशरथ कहे न कोइ ॥अवगुन कबनु नाथ मोहि मारा ।जनम जनम मुनि जतन कराहीं ।अंत राम कहि आवत नाहीं ॥सुर नर मुनि सबकी यह रीती ।स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥ह्रदय राखि कोशलपुर राजा जे रामेश्वर दरसनु करिहहिं ।ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥राघवं शरणं गत: ।निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥विभीषन शरण आयो, करऽयो लंकाधीश ।यह सुनी रावण शरण आये तो करहुं कौशलाधीश ॥ब्रम्हविद ब्रम्हौव भवति ।श्रीराम जैसा कोई पुत्र नहीं हुआ ।वसिष्ठ जैसा कोई गुरु नहीं हुआ ।दशरथ जैसा कोई पिता नहीं हुआ ।कौशल्या जैसा कोई माता नहीं हुई ।श्रीराम जैसा कोई पिता नहीं हुआ ।सीता जैसा कोई पत्नी नहीं हुई ।भरत जैसा कोई भाई नही हुआ ।रावण जैसा कोई शत्रु नहीं हुआ ।बालकांड श्रीराम का चरण है ।अयोध्याकांड श्रीराम का जंघा है ।अरण्यकांड श्रीराम का उदर है ।किष्किंधाकांड श्रीराम का ह्रदय है ।सुंदरकांड श्रीराम का कंठ है ।लंकाकांड श्रीराम का मुख है ।उत्तरकांड श्रीराम का मस्तक है ।कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई ।जब तब सुमिरन भजन न होई ॥एहि तन कर फल विषय न भाई ।स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई ॥नरतनु पाइ विषय मन देहीं ।पलटि सुधा ते सठ विष लेहीं ॥न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥जीर्यतो या न जीर्यते ।भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता: ।तृष्णा न जीर्ण वयमेव जीर्ण: ॥गीता में कहा गया हैं :---न मे भक्त: प्रणश्यति ।न कामयेऽहं गतिंइश्वरात् परामष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।आर्ति प्रपद्येऽखिलदेहमाजामन्त: स्थिंतोयेन भवन्त्यदु:खा: ॥हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ N/A References : N/A Last Updated : November 11, 2016 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. 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