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भागुरि n. सुविख्यात व्याकरणकार, कोशकार, ज्योतिषशास्त्रज्ञ एवं स्मृतिकार । उन विभिन्न विषयों पर इसके नाम पर अनेकानेक ग्रंथ उपलब्ध हैं, किंतु इन सब ग्रंथो का प्रवक्ता एक ही भागुरि है या भिन्न भिन्न, यह अज्ञात है । संभवतः ‘भागुरि’ इसका पैतृक नाम था, एवं इसके पिता का नाम ‘भगुर’ था । पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य में, लोकायतशास्त्र पर व्याख्या लिखनेवाली भागुरी नामक किसी स्त्री का निर्देश प्राप्त है [महा.७.३.४५] । संभव हैं, वह स्त्री आचार्य भागुरि की बहन हो । इसके गुरु का नाम बृहद्गर्ग था । मेरु पर्वत का आकार चतुष्कोनयुक्त है, ऐसा इसका मत वायु में उद्धृत किया गया है [वायु.३४.६२] ।
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भागुरि n. यद्यपि पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ में भागुरि का निर्देश अप्राप्य है, तथापि अन्य व्याकरण ग्रंथों में भागुरि के काफी उद्धरण लिये गये है । इन उद्धरणों से प्रतीत-होता हैं कि, इसका व्याकरण भलीप्रकार परिष्कृत एवं श्लोकबद्ध था, एवं वह पाणीनीय व्याकरण से कुछ विस्तृत था । भागुरि का यह अभिमत था कि, जिन शब्दों का प्रारंभ ‘अपि’ अथवा ‘अव’ उपसर्ग से होता हैं वहॉं ‘अ’ का लोप होता है (जैसे कि, अवगाह=वगाह, अपिधान=पिधान) । इसक यह भी सिद्धान्त था कि, हलन्त शब्दों की प्रक्रिया में हलन्त का लोप हो कर ‘आ’ प्रत्यय लगाया जाता है (जैसे कि, वाक्=वाचा दिश्=दिशा) । भागुरि के व्याकरणविषयक कुछ और उद्धरण जगदीश तर्कालंकार ने अपने ‘शब्दशक्तिप्रकाशिका’ में उद्धृत किये है ।
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भागुरि n. पुरुषोत्तमदेव की ‘भाषावृत्ति,’ एवं सृष्टिधरकृत’, ‘भाषावृत्ति टीका’ से प्रतीत होता है कि, भागुरि के द्वारा ‘त्रिकाण्डकोश’ नामक एक शब्दकोश की रचना की गयी थी । इसका यह कोश आज भी उपलब्ध हैं एवं क्षीरस्वामिन्, हलायुध, महेश्वर, हेमचंद्र, केशव, महीष, मेदिनीकार, राममुक्त एवं मल्लीनाथ आदि शब्द-कोशकारो ने इसके वचन उदधृत किये है । ‘माधवीयधातु वृत्ति,’ एवं ‘अमरकोश’ की अनेकानेक टीकाग्रंथों में इसके मतों के उद्धरण प्राप्त हैं ।
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भागुरि n. भागुरि के ज्योतिषशास्त्रविषयक मतों का निर्देश वराहमिहिर कृत ‘बृहत्संहिता’, भोज कृत ‘राजमार्तड’, एवं ‘गर्गसंहिता’ आदि ग्रंथों में प्राप्य है । [बृहत्सं.४८.२] ।
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