भर्तृहरि

भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।


योगिराज भर्तृहरिका पवित्र नाम वैराग्यका ज्वलन्त प्रतीक है । वे त्याग, वैराग्य और तपके प्रतिनिधी थे । हिमालयसे कन्याअन्तरीपतकके भूमिभागमें उनकी पद्यबद्ध पवित्र जीवन - गाथा भिन्न - भिन्न भाषाओंमे योगियों और वैरागियोंद्वारा एक अनिश्चित कालसे गायी जा रही है और भविष्यमें भी बहुत दिनोंतक यही क्रम चलता रहेगा ।

महाराज भर्तृहरि निःसन्देह विक्रमकी पहली सदीमें उपस्थित थे । उज्जैनके अधिपति थे । उनके पिता महाराज गन्धर्वसेन बहुत योग्य शासक थे । उनके दो विवाह हुए । पहलेसे महाराज भर्तृहरि और दूसरेसे महाराज विक्रमादित्य हुए थे । पिताकी मृत्युके बाद भर्तुहरिने राजकार्य सँभाला । विक्रमके सबल कन्धोंपर शासनभार सन्निहित कर वे निश्चिन्त हो गये । उनका जीवन कुछ विलासी हो गया था । वे असाधारण कवि और राजनीतिज्ञ तथा संस्कृतके प्रकाण्ड पण्डित थे । उन्होंने अपने पाण्डित्य और नीतिज्ञता तथा काव्य - ज्ञानका सदुपयोग श्रृङ्गार और नीतिपूर्ण रचना तथा साहित्यसंवर्धनमें किया । विक्रमादित्यने उनकी विलासी मनोवृत्तिके प्रति विद्रोह किया । देश उस समय विदेशी आक्रमणसे भयाक्रान्त था, समाज और धर्मपर बौद्धधर्मके विकृत रुपका ताण्डव हो रहा था । भर्तृहरिने विक्रमादित्यको राज्यसे निर्वासित कर दिया, पर समय सबसे अधिक बलवान् होता है । विधाताने भर्तृहरिके भालमें योग - लिपि लिखी थी । एक दिन जब उन्हें पूर्णरुपसे पता चल गया कि जिस पिङ्गलाको वे प्राणोंसे भी प्रिय समझते हैं, वह तो काली नागिन है - वह तो अश्वशालाके अध्यक्षके प्रेम - आबद्ध है - उनको वैराग्य हो गया । वे असार - संसारका त्याग करके राजमहलसे बाहर निकल पड़े । उन्हें विश्वास हो गया कि ' विषम - भोगमें रोगका भय है, कुलमें च्युतिका, धनमें राज्यका, शास्त्रमें विवादका, गुणमें दुर्जनका, शरीरमें मृत्युका - यों संसारकी सभी वस्तुएँ भयाव ह हैं, केवल वैराग्य ही अभय है ।' उनके श्रृङ्गार और नीतिपरक जीवनमें वैराग्यका समावेश हो गया, उनके अधरोंपर शिवनामामृततरङ्गिणीका नृत्य होने लगा, तृष्णा और वासनाने त्याग और तपस्याकी विशेषता सिद्ध की । उन्होंने अपने आत्यामें परमात्माकी व्याप्ति पायी, ब्रह्मानुभूति की, वेदान्तके सत्यका वरण किया । उन्होंने अपने - आपको धिक्कारा कि ' विषयोंको हमने नहीं भोगा है, उन्होंने हमें ही भोग डाला है; हमने तप नहीं किया, तपोंने ही हमको तपा डाला है; कालका अन्त नहीं हुआ, उसीने हमारा अन्त कर डाला है; हम जीर्ण हो चले, पर तृष्णाका अभाव नहीं हुआ ।' उनका जीवन साधनमय और ज्ञानपूर्ण हो उठा । उन्होंने शिवतत्त्वकी प्राप्ति की । ज्ञानोदयने शिवके रुपमें उन्हे शान्तिका अधिकारी बनाया । संसारके आघात - प्रतिघातसे दूर रहकर उन्होंने ब्रह्मके शिवरुपकी साधना की, वैराग्यका अद्भुत सागर उँडेलकर आध्यात्मिक चेतनाको नया जीवन दिया । उन्होंने दसों दिशाओं और तीनों कालोंमें परिपूर्ण, अनन्त चैतन्यस्वरुप अनुभवगम्य, शान्त और तेजोमय ब्रह्मकी उपासना की । विरक्ति ही उनकी एकमात्र सङ्गिनी हो चली । महादेव ही उनके एकमात्र देव थे । वे आशाकी कर्मनासासे पार होकर भक्तिकी भागीरथीमें गोते लगाने लगे ।

उन्होंने श्रृङ्गार - नीति - शास्त्रोंकी तो रचना की ही थी, अब उन्होंने वैराग्यशतककी रचना की । व्याकरण शास्त्रका परम प्रसिद्ध ग्रन्थ ' वाक्यपदीय ' उनके महान् पाण्डित्यका परिचायक है । वे शब्द - विद्याके मौलिक आचार्य थे । शब्द ' ब्रह्मा ' का साक्षात् रुप है । अतएव वे ' शिवभक्त ' होनेके साथ - ही - साथ ' शब्दभक्त ' भी थे । शब्द - ब्रह्मका ही अर्थरुप नानात्मक जगत - विवर्त है । योगी शब्द - ब्रह्मसे तादात्म्य हो जानेको मोक्ष मानते हैं । भर्तृहरि शब्द - ब्रह्मके योगी थे । उनका वैराग्यदर्शन परमात्माके साक्षात्कारका पर्यात है ।

उनकी समाधि अलवर राज्यके एक सघन वनमें अब भी विद्यमान है । उसके सातवें दरवाजेपर एक अखण्ड दीपक जलता रहता है । उसे ' भर्तृहरिकी ज्योति ' स्वीकार किया जाता है । भर्तृहरि महान् शिवभक्त और सिद्ध योगी थे ।

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Last Updated : April 28, 2009

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