८१. माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि।
तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि॥टेक॥
जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा॥१॥
जउ तुम दीवरा तउ हम बाती।
जउ तुम तीरथ तउ हम जाती॥२॥
साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी।
तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी॥३॥
जह जह जाउ तहा तेरी सेवा।
तुम सो ठाकुरु अउरु न देवा॥४॥
तुमरे भजन कटहि जम फाँसा।
भगति हेत गावै रविदासा॥५॥
(राग सोरठी)
८२. माधौ अविद्या हित कीन्ह
माधौ अविद्या हित कीन्ह।
ताथैं मैं तोर नांव न लीन्ह॥ टेक॥
मिग्र मीन भ्रिग पतंग कुंजर, एक दोस बिनास।
पंच ब्याधि असाधि इहि तन, कौंन ताकी आस॥१॥
जल थल जीव जंत जहाँ-जहाँ लौं करम पासा जाइ।
मोह पासि अबध बाधौ, करियै कौंण उपाइ॥२॥
त्रिजुग जोनि अचेत संम भूमि, पाप पुन्य न सोच।
मानिषा अवतार दुरलभ, तिहू संकुट पोच॥३॥
रैदास दास उदास बन भव, जप न तप गुरु ग्यांन।
भगत जन भौ हरन कहियत, ऐसै परंम निधांन॥४॥
(राग आसा)
८३. माधौ भ्रम कैसैं न बिलाइ
माधौ भ्रम कैसैं न बिलाइ।
ताथैं द्वती भाव दरसाइ॥ टेक॥
कनक कुंडल सूत्र पट जुदा, रजु भुजंग भ्रम जैसा।
जल तरंग पांहन प्रितमां ज्यूँ, ब्रह्म जीव द्वती ऐसा॥१॥
बिमल ऐक रस, उपजै न बिनसै, उदै अस्त दोई नांहीं।
बिगता बिगति गता गति नांहीं, बसत बसै सब मांहीं॥२॥
निहचल निराकार अजीत अनूपम, निरभै गति गोब्यंदा।
अगम अगोचर अखिर अतरक, न्रिगुण नित आनंदा॥३॥
सदा अतीत ग्यांन ध्यानं बिरिजित, नीरबिकांर अबिनासी।
कहै रैदास सहज सूंनि सति, जीवन मुकति निधि कासी॥४॥
(राग सोरठी)
८४. माधौ संगति सरनि तुम्हारी
माधौ संगति सरनि तुम्हारी।
जगजीवन कृश्न मुरारी॥ टेक॥
तुम्ह मखतूल गुलाल चत्रभुज, मैं बपुरौ जस कीरा।
पीवत डाल फूल रस अंमृत, सहजि भई मति हीरा॥१॥
तुम्ह चंदन मैं अरंड बापुरौ, निकटि तुम्हारी बासा।
नीच बिरख थैं ऊँच भये, तेरी बास सुबास निवासा॥२॥
जाति भी वोंछी जनम भी वोछा, वोछा करम हमारा।
हम सरनागति रांम राइ की, कहै रैदास बिचारा॥३॥
(राग आसा)
८५. माया मोहिला कान्ह
माया मोहिला कान्ह।
मैं जन सेवग तोरा॥ टेक॥
संसार परपंच मैं ब्याकुल परंमांनंदा।
त्राहि त्राहि अनाथ नाथ गोब्यंदा॥१॥
रैदास बिनवैं कर जोरी।
अबिगत नाथ कवन गति मोरी॥२॥
(राग कानड़ा)
८६. मिलत पिआरों प्रान नाथु कवन भगति ते
मिलत पिआरों प्रान नाथु कवन भगति ते।
साध संगति पाइ परम गते॥ टेक॥
मैले कपरे कहा लउ धोवउ, आवैगी नीद कहा लगु सोवउ॥१॥
जोई जोई जोरिओ सोई-सोई फाटिओ।
झूठै बनजि उठि ही गई हाटिओ॥२॥
कहु रविदास भइयो जब लेखो।
जोई जोई कीनो सोई-सोई देखिओ॥३॥
(राग मल्हार)
८७. मेरी प्रीति गोपाल सूँ जिनि घटै हो
मेरी प्रीति गोपाल सूँ जिनि घटै हो।
मैं मोलि महँगी लई तन सटै हो॥ टेक॥
हिरदै सुमिरंन करौं नैन आलोकनां, श्रवनां हरि कथा पूरि राखूँ।
मन मधुकर करौ, चरणां चित धरौं, रांम रसांइन रसना चाखूँ॥१॥
साध संगति बिनां भाव नहीं उपजै, भाव बिन भगति क्यूँ होइ तेरी।
बंदत रैदास रघुनाथ सुणि बीनती, गुर प्रसादि क्रिया करौ मेरी॥२॥
(राग धनाश्री)
८८. मैं का जांनूं देव मैं का जांनू
मैं का जांनूं देव मैं का जांनू।
मन माया के हाथि बिकांनूं॥ टेक॥
चंचल मनवां चहु दिसि धावै; जिभ्या इंद्री हाथि न आवै।
तुम तौ आहि जगत गुर स्वांमीं, हम कहियत कलिजुग के कांमी॥१॥
लोक बेद मेरे सुकृत बढ़ाई, लोक लीक मोपैं तजी न जाई।
इन मिलि मेरौ मन जु बिगार्यौ, दिन दिन हरि जी सूँ अंतर पार्यौ॥२॥
सनक सनंदन महा मुनि ग्यांनी, सुख नारद ब्यास इहै बखांनीं।
गावत निगम उमांपति स्वांमीं, सेस सहंस मुख कीरति गांमी॥३॥
जहाँ जहाँ जांऊँ तहाँ दुख की रासी, जौ न पतियाइ साध है साखी।
जमदूतनि बहु बिधि करि मार्यौ, तऊ निलज अजहूँ नहीं हार्यौ॥४॥
हरि पद बिमुख आस नहीं छूटै, ताथैं त्रिसनां दिन दिन लूटै।
बहु बिधि करम लीयैं भटकावै, तुमहि दोस हरि कौं न लगावै॥५॥
केवल रांम नांम नहीं लीया। संतुति विषै स्वादि चित दीया।
कहै रैदास कहाँ लग कहिये, बिन जग नाथ सदा सुख सहियै॥६॥
(राग धनाश्री)
८९. मो सउ कोऊ न कहै समझाइ
मो सउ कोऊ न कहै समझाइ।
जाते आवागवनु बिलाइ॥ टेक॥
सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार।
तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार॥१॥
पार कैसे पाइबो रे॥
बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ।
कवन करम ते छूटी ऐ जिह साधे सभ सिधि होई॥२॥
करम अकरम बीचारी ए संका सुनि बेद पुरान।
संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु॥३॥
बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिध बिकार।
सुध कवन पर होइबो सुव कुंजर बिधि बिउहार॥४॥
रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार।
पारस मानो ताबो छुए कनक होत नहीं बार॥५॥
परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट।
उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट॥६॥
भगत जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार।
सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार॥७॥
अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास।
प्रेम भगति नहीं उपजै ता ते रविदास उदास॥८॥
(राग गौड़ी बैरागणि)
९०. यह अंदेस सोच जिय मेरे
यह अंदेस सोच जिय मेरे ।
निसिबासर गुन गाऊ~म तेरे ॥टेक॥
तुम चिंतित मेरी चिंतहु जाई ।
तुम चिंतामनि हौ एक नाई ॥१॥
भगत-हेत का का नहिं कीन्हा ।
हमरी बेर भए बलहीना ॥२॥
कह रैदास दास अपराधी ।
जेहि तुम द्रवौ सो भगति न साधी ॥३॥