पदावली - १ ते १०

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


१. अखि लखि लै नहीं का कहि पंडित, कोई न कहै समझाई
अखि लखि लै नहीं का कहि पंडित, कोई न कहै समझाई।
अबरन बरन रूप नहीं जाके, सु कहाँ ल्यौ लाइ समाई॥ टेक॥
चंद सूर नहीं राति दिवस नहीं, धरनि अकास न भाई।
करम अकरम नहीं सुभ असुभ नहीं, का कहि देहु बड़ाई॥१॥
सीत बाइ उश्न नहीं सरवत, कांम कुटिल नहीं होई।
जोग न भोग रोग नहीं जाकै, कहौ नांव सति सोई॥२॥
निरंजन निराकार निरलेपहि, निरबिकार निरासी।
काम कुटिल ताही कहि गावत, हर हर आवै हासी॥३॥
गगन धूर धूसर नहीं जाकै, पवन पूर नहीं पांनी।
गुन बिगुन कहियत नहीं जाकै, कहौ तुम्ह बात सयांनीं॥४॥
याही सूँ तुम्ह जोग कहते हौ, जब लग आस की पासी।
छूटै तब हीं जब मिलै एक ही, भणै रैदास उदासी॥५॥


२. अब कुछ मरम बिचारा हो हरि


अब कुछ मरम बिचारा हो हरि।
आदि अंति औसांण राम बिन, कोई न करै निरवारा हो हरि॥ टेक॥
जल मैं पंक पंक अमृत जल, जलहि सुधा कै जैसैं।
ऐसैं करमि धरमि जीव बाँध्यौ, छूटै तुम्ह बिन कैसैं हो हरि॥१॥
जप तप बिधि निषेद करुणांमैं, पाप पुनि दोऊ माया।
अस मो हित मन गति विमुख धन, जनमि जनमि डहकाया हो हरि॥२॥
ताड़ण, छेदण, त्रायण, खेदण, बहु बिधि करि ले उपाई।
लूंण खड़ी संजोग बिनां, जैसैं कनक कलंक न जाई॥३॥
भणैं रैदास कठिन कलि केवल, कहा उपाइ अब कीजै।
भौ बूड़त भैभीत भगत जन, कर अवलंबन दीजै॥४॥

३. अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी ।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ।

४. अब मैं हार्यौ रे भाई

अब मैं हार्यौ रे भाई।
थकित भयौ सब हाल चाल थैं, लोग न बेद बड़ाई॥ टेक॥
थकित भयौ गाइण अरु नाचण, थाकी सेवा पूजा।
काम क्रोध थैं देह थकित भई, कहूँ कहाँ लूँ दूजा॥१॥
रांम जन होउ न भगत कहाँऊँ, चरन पखालूँ न देवा।
जोई-जोई करौ उलटि मोहि बाधै, ताथैं निकटि न भेवा॥२॥
पहली ग्यांन का कीया चांदिणां, पीछैं दीया बुझाई।
सुनि सहज मैं दोऊ त्यागे, राम कहूँ न खुदाई॥३॥
दूरि बसै षट क्रम सकल अरु, दूरिब कीन्हे सेऊ।
ग्यान ध्यानं दोऊ दूरि कीन्हे, दूरिब छाड़े तेऊ॥४॥
पंचू थकित भये जहाँ-तहाँ, जहाँ-तहाँ थिति पाई।
जा करनि मैं दौर्यौ फिरतौ, सो अब घट मैं पाई॥५॥
पंचू मेरी सखी सहेली, तिनि निधि दई दिखाई।
अब मन फूलि भयौ जग महियां, उलटि आप मैं समाई॥६॥
चलत चलत मेरौ निज मन थाक्यौ, अब मोपैं चल्यौ न जाई।
सांई सहजि मिल्यौ सोई सनमुख, कहै रैदास बताई॥७॥


५. अब मोरी बूड़ी रे भाई

अब मोरी बूड़ी रे भाई।
ता थैं चढ़ी लोग बड़ाई॥ टेक॥
अति अहंकार ऊर मां, सत रज तामैं रह्यौ उरझाई।
करम बलि बसि पर्यौ कछू न सूझै, स्वांमी नांऊं भुलाई॥१॥
हम मांनूं गुनी जोग सुनि जुगता, हम महा पुरिष रे भाई।
हम मांनूं सूर सकल बिधि त्यागी, ममिता नहीं मिटाई॥२॥
मांनूं अखिल सुनि मन सोध्यौ, सब चेतनि सुधि पाई।
ग्यांन ध्यांन सब हीं हंम जांन्यूं, बूझै कौंन सूं जाई॥३॥
हम मांनूं प्रेम प्रेम रस जांन्यूं, नौ बिधि भगति कराई।
स्वांग देखि सब ही जग लटक्यौ, फिरि आपन पौर बधाई॥४॥
स्वांग पहरि हम साच न जांन्यूं, लोकनि इहै भरमाई।
स्यंघ रूप देखी पहराई, बोली तब सुधि पाई॥५॥
ऐसी भगति हमारी संतौ, प्रभुता इहै बड़ाई।
आपन अनिन और नहीं मांनत, ताथैं मूल गँवाई॥६॥
भणैं रैदास उदास ताही थैं, इब कछू मोपैं करी न जाई।
आपौ खोयां भगति होत है, तब रहै अंतरि उरझाई॥७॥ (राग रामकली)


६. अब हम खूब बतन घर पाया

अब हम खूब बतन घर पाया।
उहॉ खैर सदा मेरे भाया॥ टेक॥
बेगमपुर सहर का नांउं, फिकर अंदेस नहीं तिहि ठॉव॥१॥
नही तहॉ सीस खलात न मार, है फन खता न तरस जवाल॥२॥
आंवन जांन रहम महसूर, जहॉ गनियाव बसै माबूँद॥३॥
जोई सैल करै सोई भावै, महरम महल मै को अटकावै॥४॥
कहै रैदास खलास चमारा, सो उस सहरि सो मीत हमारा॥५॥
(राग गौड़ी)

७. अबिगत नाथ निरंजन देवा

अबिगत नाथ निरंजन देवा।
मैं का जांनूं तुम्हारी सेवा॥ टेक॥
बांधू न बंधन छांऊँ न छाया, तुमहीं सेऊँ निरंजन राया॥१॥
चरन पताल सीस असमांना, सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना॥२॥
सिव सनिकादिक अंत न पाया, खोजत ब्रह्मा जनम गवाया॥३॥
तोडूँ न पाती पूजौं न देवा, सहज समाधि करौं हरि सेवा॥४॥
नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा, रोमावली अठारह भारा॥५॥
चारि बेद जाकै सुमृत सासा, भगति हेत गावै रैदासा॥६॥


८. अहो देव तेरी अमित महिमां, महादैवी माया

अहो देव तेरी अमित महिमां, महादैवी माया।
मनुज दनुज बन दहन, कलि विष कलि किरत सबै समय समंन॥
निरबांन पद भुवन, नांम बिघनोघ पवन पात॥ टेक॥
गरग उत्तम बांमदेव, विस्वामित्र ब्यास जमदंग्नि श्रिंगी ऋषि दुर्बासा।
मारकंडेय बालमीक भ्रिगु अंगिरा, कपिल बगदालिम सुकमातंम न्यासा॥१॥
अत्रिय अष्टाब्रक गुर गंजानन, अगस्ति पुलस्ति पारासुर सिव विधाता।
रिष जड़ भरथ सऊ भरिष, चिवनि बसिष्टि जिह्वनि ज्यागबलिक तव ध्यांनि राता॥२॥
ध्रू अंबरीक प्रहलाद नारद, बिदुर द्रोवणि अक्रूर पांडव सुदांमां।
भीषम उधव बभीषन चंद्रहास, बलि कलि भक्ति जुक्ति जयदेव नांमां॥३॥
गरुड़ हनूंमांनु मांन जनकात्मजा, जय बिजय द्रोपदी गिरि सुता श्री प्रचेता।
रुकमांगद अंगद बसदेव देवकी, अवर अमिनत भक्त कहूँ केता॥४॥
हे देव सेष सनकादि श्रुति भागवत, भारती स्तवत अनिवरत गुणर्दुबगेवं।
अकल अबिछन ब्यापक ब्रह्ममेक रस सुध चैतंनि पूरन मनेवं॥५॥
सरगुण निरगुण निरामय निरबिकार, हरि अज निरंजन बिमल अप्रमेवं।
प्रमात्मां प्रक्रिति पर प्रमुचित, सचिदांनंद गुर ग्यांन मेवं॥६॥
हे देव पवन पावक अवनि, जलधि जलधर तरंनि।
काल जाम मिृति ग्रह ब्याध्य बाधा, गज भुजंग भुवपाल।
ससि सक्र दिगपाल, आग्या अनुगत न मुचत मृजादा॥७॥
अभय बर ब्रिद प्रतंग्या सति संकल्प, हरि दुष्ट तारंन चरंन सरंन तेरैं।
दास रैदास यह काल ब्याकुल, त्राहि त्राहि अवर अवलंबन नहीं मेरैं॥८॥
(राग धनाश्री)


९. आज दिवस लेऊँ बलिहारा

आज दिवस लेऊँ बलिहारा ।
मेरे घर आया रामका प्यारा ॥टेक॥
आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥१॥
करूँ डंडवत चरन पखारूँ ।
तन-मन-धन उन उपरि वारूँ ॥२॥
कथा कहै अरु अरथ बिचारैं ।
आप तरैं औरन को तारैं ॥३॥
कह रैदास मिलैं निज दासा ।
जनम जनमकै काटैं पासा ॥४॥

१०. आज नां द्यौस नां ल्यौ बलिहारा


आज नां द्यौस नां ल्यौ बलिहारा।
मेरे ग्रिह आया राजा रांम जी का प्यारा॥ टेक॥
आंगण बठाड़ भवन भयौ पांवन, हरिजन बैठे हरि जस गावन॥१॥
करूँ डंडौत चरन पखालूँ, तन मन धंन उन ऊपरि वारौं॥२॥
कथा कहै अरु अरथ बिचारै, आपन तिरैं और कूँ तारैं॥३॥
कहै रैदास मिले निज दास, जनम जनम के कटे पास॥४॥
(राग गुंड)

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Last Updated : September 07, 2026

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