७१. बंदे जानि साहिब गनीं
बंदे जानि साहिब गनीं।
संमझि बेद कतेब बोलै, ख्वाब मैं क्या मनीं॥ टेक॥
ज्वांनीं दुनी जमाल सूरति, देखिये थिर नांहि बे।
दम छसै सहंस्र इकवीस हरि दिन, खजांनें थैं जांहि बे॥१॥
मतीं मारे ग्रब गाफिल, बेमिहर बेपीर बे।
दरी खानैं पड़ै चोभा, होत नहीं तकसीर बे॥२॥
कुछ गाँठि खरची मिहर तोसा, खैर खूबी हाथि बे।
धणीं का फुरमांन आया, तब कीया चालै साथ बे॥३॥
तजि बद जबां बेनजरि कम दिल, करि खसकी कांणि बे।
रैदास की अरदास सुणि, कछू हक हलाल पिछांणि बे॥४॥
(राग आसा)
७२. भगति ऐसी सुनहु रे भाई
भगति ऐसी सुनहु रे भाई।
आई भगति तब गई बड़ाई॥ टेक॥
कहा भयौ नाचैं अरु गायैं, कहौं भयौ तप कीन्हैं।
कहा भयौ जे चरन पखालै, जो परम तत नहीं चीन्हैं॥१॥
कहा भयौ जू मूँड मुंड़ायौ, बहु तीरथ ब्रत कीन्हैं।
स्वांमी दास भगत अरु सेवग, जो परंम तत नहीं चीन्हैं॥२॥
कहै रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमांन मेटि आपा पर, पिपलक होइ चुणि खावै॥३॥
७३. भाई रे भ्रम भगति सुजांनि
भाई रे भ्रम भगति सुजांनि।
जौ लूँ नहीं साच सूँ पहिचानि॥ टेक॥
भ्रम नाचण भ्रम गाइण, भ्रम जप तप दांन।
भ्रम सेवा भ्रम पूजा, भ्रम सूँ पहिचांनि॥१॥
भ्रम षट क्रम सकल सहिता, भ्रम गृह बन जांनि।
भ्रम करि करम कीये, भरम की यहु बांनि॥२॥
भ्रम इंद्री निग्रह कीयां, भ्रंम गुफा में बास।
भ्रम तौ लौं जांणियै, सुनि की करै आस॥३॥
भ्रम सुध सरीर जौ लौं, भ्रम नांउ बिनांउं।
भ्रम भणि रैदास तौ लौं, जो लौं चाहे ठांउं॥४॥
(राग रामकली)
७४. भाई रे रांम कहाँ हैं मोहि बतावो
भाई रे रांम कहाँ हैं मोहि बतावो।
सति रांम ताकै निकटि न आवो॥ टेक॥
राम कहत जगत भुलाना, सो यहु रांम न होई।
करंम अकरंम करुणांमै केसौ, करता नांउं सु कोई॥१॥
जा रामहि सब जग जानैं, भ्रमि भूले रे भाई।
आप आप थैं कोई न जांणै, कहै कौंन सू जाई॥२॥
सति तन लोभ परसि जीय तन मन, गुण परस नहीं जाई।
अखिल नांउं जाकौ ठौर न कतहूँ, क्यूं न कहै समझाई॥३॥
भयौ रैदास उदास ताही थैं, करता को है भाई।
केवल करता एक सही करि, सति रांम तिहि ठांई॥४॥
(राग रामकली)
७५. भाई रे सहज बन्दी लोई
भाई रे सहज बन्दी लोई, बिन सहज सिद्धि न होई।
लौ लीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होई॥ टेक।
आपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस।
कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देस॥१॥
कहिये तो कहिये काहि कहिये, कहाँ कौन पतियाइ।
रैदास दास अजान है करि, रह्यो सहज समाइ॥२॥
(राग आसा)
७६. भेष लियो पै भेद न जान्यो
भेष लियो पै भेद न जान्यो।
अमृत लेई विषै सो मान्यो॥ टेक॥
काम क्रोध में जनम गँवायो, साधु सँगति मिलि राम न गायो॥१॥
तिलक दियो पै तपनि न जाई, माला पहिरे घनेरी लाई॥२॥
कह रैदास परम जो पाऊँ, देव निरंजन सत कर ध्याऊँ॥३॥
(राग भैरूँ-भैरव)
७७. मन मेरे सोई सरूप बिचार
मन मेरे सोई सरूप बिचार।
आदि अंत अनंत परंम पद, संसै सकल निवारं॥ टेक॥
जस हरि कहियत तस तौ नहीं, है अस जस कछू तैसा।
जानत जानत जानि रह्यौ मन, ताकौ मरम कहौ निज कैसा॥१॥
कहियत आन अनुभवत आन, रस मिल्या न बेगर होई।
बाहरि भीतरि गुप्त प्रगट, घट घट प्रति और न कोई॥२॥
आदि ही येक अंति सो एकै, मधि उपाधि सु कैसे।
है सो येक पै भ्रम तैं दूजा, कनक अल्यंकृत जैसैं॥३॥
कहै रैदास प्रकास परम पद, का जप तप ब्रत पूजा।
एक अनेक येक हरि, करौं कवण बिधि दूजा॥४॥
(राग सोरठी)
७८. मरम कैसैं पाइबौ रे
मरम कैसैं पाइबौ रे।
पंडित कोई न कहै समझाइ, जाथैं मरौ आवागवन बिलाइ॥ टेक॥
बहु बिधि धरम निरूपिये, करता दीसै सब लोई।
जाहि धरम भ्रम छूटिये, ताहि न चीन्हैं कोई॥१॥
अक्रम क्रम बिचारिये, सुण संक्या बेद पुरांन।
बाकै हृदै भै भ्रम, हरि बिन कौंन हरै अभिमांन॥२॥
सतजुग सत त्रेता तप, द्वापरि पूजा आचार।
तीन्यूं जुग तीन्यूं दिढी, कलि केवल नांव अधार॥३॥
बाहरि अंग पखालिये, घट भीतरि बिबधि बिकार।
सुचि कवन परिहोइये, कुंजर गति ब्यौहार॥४॥
रवि प्रकास रजनी जथा, गत दीसै संसार पारस मनि तांबौ छिवै।
कनक होत नहीं बार, धन जोबन प्रभु नां मिलै॥५॥
ना मिलै कुल करनी आचार।
एकै अनेक बिगाइया, ताकौं जाणैं सब संसार॥६॥
अनेक जतन करि टारिये, टारी टरै न भ्रम पास।
प्रेम भगति नहीं उपजै, ताथैं रैदास उदास॥७॥
(राग गौड़ी)
७९. माटी को पुतरा कैसे नचतु है
माटी को पुतरा कैसे नचतु है।
देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है॥ टेक॥
जब कुछ पावै तब गरबु करतु है।
माइआ गई तब रोवनु लगतु है॥१॥
मन बच क्रम रस कसहि लुभाना।
बिनसि गइआ जाइ कहूँ समाना॥२॥
कहि रविदास बाजी जगु भाई।
बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनि आई॥३॥
(राग आसा)
८०. माधवे का कहिये भ्रम ऐसा
माधवे का कहिये भ्रम ऐसा।
तुम कहियत होह न जैसा॥ टेक॥
न्रिपति एक सेज सुख सूता, सुपिनैं भया भिखारी।
अछित राज बहुत दुख पायौ, सा गति भई हमारी॥१॥
जब हम हुते तबैं तुम्ह नांहीं, अब तुम्ह हौ मैं नांहीं।
सलिता गवन कीयौ लहरि महोदधि, जल केवल जल मांही॥२॥
रजु भुजंग रजनी प्रकासा, अस कछु मरम जनावा।
संमझि परी मोहि कनक अल्यंक्रत ज्यूं, अब कछू कहत न आवा॥३॥
करता एक भाव जगि भुगता, सब घट सब बिधि सोई।
कहै रैदास भगति एक उपजी, सहजैं होइ स होई॥४॥
(राग सोरठी)