पदावली - ६१ ते ७०

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


६१. पहलै पहरै रैंणि दै बणजारिया

पहलै पहरै रैंणि दै बणजारिया, तै जनम लीया संसार वै॥
सेवा चुका रांम की बणजारिया, तेरी बालक बुधि गँवार वे॥
बालक बुधि गँवार न चेत्या, भुला माया जालु वे॥
कहा होइ पीछैं पछतायैं, जल पहली न बँधीं पाल वे॥
बीस बरस का भया अयांनां, थंभि न सक्या भार वे॥
जन रैदास कहै बनिजारा, तैं जनम लया संसार वै॥१॥

दूजै पहरै रैंणि दै बनजारिया, तूँ निरखत चल्या छांवं वे॥
हरि न दामोदर ध्याइया बनजारिया, तैं लेइ न सक्या नांव वे॥
नांउं न लीया औगुन कीया, इस जोबन दै तांण वे॥
अपणीं पराई गिणीं न काई, मंदे कंम कमांण वे॥
साहिब लेखा लेसी तूँ भरि देसी, भीड़ पड़ै तुझ तांव वे॥
जन रैदास कहै बनजारा, तू निरखत चल्या छांव वे॥२॥

तीजै पहरै रैणिं दै बनजारिया, तेरे ढिलढ़े पड़े परांण वे॥
काया रवंनीं क्या करै बनजारिया, घट भीतरि बसै कुजांण वे॥
इक बसै कुजांण काया गढ़ भीतरि, अहलां जनम गवाया वे॥
अब की बेर न सुकृत कीता, बहुरि न न यहु गढ़ पाया वे॥
कंपी देह काया गढ़ खीनां, फिरि लगा पछितांणवे॥
जन रैदास कहै बनिजारा, तेरे ढिलड़े पड़े परांण वे॥३॥

चौथे पहरै रैंणि दै बनजारिया, तेरी कंपण लगी देह वे॥
साहिब लेखा मंगिया बनजारिया, तू छडि पुरांणां थेह वे॥
छड़ि पुरांणं ज्यंद अयांणां, बालदि हाकि सबेरिया॥
जम के आये बंधि चलाये, बारी पुगी तेरिया॥
पंथि चलै अकेला होइ दुहेला, किस कूँ देइ सनेहं वे॥
जन रैदास कहै बनिजारा, तेरी कंपण लगी देह वे॥४॥
(राग जंगली गौड़ी)

६२. प्रभु जी तुम चंदन हम पानी

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै ‘रैदासा॥

६३. प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी

प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी।जग-जीवन राम मुरारी॥
गली-गली को जल बहि आयो, सुरसरि जाय समायो।
संगति के परताप महातम, नाम गंगोदक पायो॥
स्वाति बूँद बरसे फनि ऊपर, सोई विष होइ जाई।
ओही बूँद कै मोती निपजै, संगति की अधिकाई॥
तुम चंदन हम रेंड बापुरे, निकट तुम्हारे आसा।
संगति के परताप महातम, आवै बास सुबासा॥
जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा।
नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कहि ‘रैदास’ चमारा॥

६४. प्रानी किआ मेरा किआ तेरा

प्रानी किआ मेरा किआ तेरा।
तैसे तरवर पंखि बसेरा॥टेक॥
जल की भीति पवन का थंभा।
रकत बुंद का गारा।
हाड़ मास नाड़ी को पिंजरू।
पंखी बसै बिचारा॥१॥
राखहु कंध उसारहु नीवां।
साढ़े तीनि हाथ तेरी सीवां॥२॥
बंके बाल पाग सिर डेरी।
इहु तनु होइगो भसम की ढेरी॥३॥
ऊचे मंदर सुंदर नारी।
राम नाम बिनु बाजी हारी॥४॥
मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी।
ओछा जनमु हमारा।
तुम सरनागति राजा रामचंद।
कहि रविदास चमारा॥५॥
(राग सोरठी)

६५. प्रीति सधारन आव

प्रीति सधारन आव।
तेज सरूपी सकल सिरोमनि, अकल निरंजन राव॥ टेक॥
पीव संगि प्रेम कबहूं नहीं पायौ, कारनि कौण बिसारी।
चक को ध्यान दधिसुत कौं होत है, त्यूँ तुम्ह थैं मैं न्यारी॥१॥
भोर भयौ मोहिं इकटग जोवत, तलपत रजनी जाइ।
पिय बिन सेज क्यूँ सुख सोऊँ, बिरह बिथा तनि माइ॥२॥
दुहागनि सुहागनि कीजै, अपनैं अंग लगाई।
कहै रैदास प्रभु तुम्हरै बिछोहै, येक पल जुग भरि जाइ॥३॥
(राग केदारा)

६६. पार गया चाहै सब कोई

पार गया चाहै सब कोई।
रहि उर वार पार नहीं होई॥ टेक॥
पार कहैं उर वार सूँ पारा,
बिन पद परचै भ्रमहि गवारा॥१॥
पार परंम पद मंझि मुरारी,
तामैं आप रमैं बनवारी॥२॥
पूरन ब्रह्म बसै सब ठाइंर्,
कहै रैदास मिले सुख सांइंर्॥३॥
(राग सोरठी)

६७. पांडे कैसी पूज रची रे

पांडे कैसी पूज रची रे।
सति बोलै सोई सतिबादी, झूठी बात बची रे॥ टेक॥
जो अबिनासी सबका करता, ब्यापि रह्यौ सब ठौर रे।
पंच तत जिनि कीया पसारा, सो यौ ही किधौं और रे॥१॥
तू ज कहत है यौ ही करता, या कौं मनिख करै रे।
तारण सकति सहीजे यामैं, तौ आपण क्यूँ न तिरै रे॥२॥
अहीं भरोसै सब जग बूझा, सुंणि पंडित की बात रे॥
याकै दरसि कौंण गुण छूटा, सब जग आया जात रे॥३॥
याकी सेव सूल नहीं भाजै, कटै न संसै पास रे।
सौचि बिचारि देखिया मूरति, यौं छाड़ौ रैदास रे॥४॥
(राग सोरठी)

६८. पांवन जस माधो तोरा

पांवन जस माधो तोरा।
तुम्ह दारन अध मोचन मोरा॥ टेक॥
कीरति तेरी पाप बिनासै, लोक बेद यूँ गावै।
जो हम पाप करत नहीं भूधर, तौ तू कहा नसावै॥१॥
जब लग अंग पंक नहीं परसै, तौ जल कहा पखालै।
मन मलन बिषिया रंस लंपट, तौ हरि नांउ संभालै॥२॥
जौ हम बिमल हिरदै चित अंतरि, दोस कवन परि धरि हौ।
कहै रैदास प्रभु तुम्ह दयाल हौ, अबंध मुकति कब करि हौ॥३॥
(राग टोड़ी)

६९. बपुरौ सति रैदास कहै

बपुरौ सति रैदास कहै।
ग्यान बिचारि नांइ चित राखै, हरि कै सरनि रहै रे॥ टेक॥
पाती तोड़ै पूज रचावै, तारण तिरण कहै रे।
मूरति मांहि बसै परमेसुर, तौ पांणी मांहि तिरै रे॥१॥
त्रिबिधि संसार कवन बिधि तिरिबौ, जे दिढ नांव न गहै रे।
नाव छाड़ि जे डूंगै बैठे, तौ दूणां दूख सहै रे॥२॥
गुरु कौं सबद अरु सुरति कुदाली, खोदत कोई लहै रे।
रांम काहू कै बाटै न आयौ, सोनैं कूल बहै रे॥३॥
झूठी माया जग डहकाया, तो तनि ताप दहै रे।
कहै रैदास रांम जपि रसनां, माया काहू कै संगि न न रहै रे॥४॥
(राग सोरठी)

७०. बरजि हो बरजि बीठल, माया जग खाया

बरजि हो बरजि बीठल, माया जग खाया।
महा प्रबल सब हीं बसि कीये, सुर नर मुनि भरमाया॥ टेक॥
बालक बिरधि तरुन अति सुंदरि, नांनां भेष बनावै।
जोगी जती तपी संन्यासी, पंडित रहण न पावै॥१॥
बाजीगर की बाजी कारनि, सबकौ कौतिग आवै।
जो देखै सो भूलि रहै, वाका चेला मरम जु पावै॥२॥
खंड ब्रह्मड लोक सब जीते, ये ही बिधि तेज जनावै।
स्वंभू कौ चित चोरि लीयौ है, वा कै पीछैं लागा धावै॥३॥
इन बातनि सुकचनि मरियत है, सबको कहै तुम्हारी।
नैन अटकि किनि राखौ केसौ, मेटहु बिपति हमारी॥४॥
कहै रैदास उदास भयौ मन, भाजि कहाँ अब जइये।
इत उत तुम्ह गौब्यंद गुसांई, तुम्ह ही मांहि समइयै॥५॥
(राग आसावरी)

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Last Updated : September 07, 2026

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