भैरव उवाच
भैरव ने कहा - हे श्री देने वाली महाभैरवि ! अब दिव्य , वीर और पशु के क्रम से भावों का वर्णन कीजिए । विशेष कर मैं आश्चर्य सम्पन्न पशुभाव के विषय में सुनने के लिए उत्सुक हूँ । हे जगदीश्वरि ! यदि भाग्यवश सिद्धि में मेरी आज्ञा का ध्यान करिए तो आहलाद समुद्र में स्थित हुआ मैं इन भावों को जानना चाहता हूँ ॥१ - २॥
महाभैरवी ने कहा --- हे पशुनाथ ! हे वीर नाथ ! हे दिव्यनाथ ! हे कृपानिधे ! हे प्रकाशरुप ज्ञान से ह्रदय को उल्लसित करने वाले ! हे चन्द्रशेखर ! अब भावों के विषय में श्रवण कीजिए । हे नाथ ! कलाओं की लता के समान आकार वाली , तपस्या से अद्वयावस्था में प्राप्त होने वाली काली ही पशुभाव में स्थित देवता हैं , अब उस पशुभाव के विषय में विस्तार पूर्वक सुनिए ॥४॥
पशुभावविवेचन - जो उत्तम पशु , दुर्गा पूजा और शिवपूज अवश्यकरणीय है - ऐसा समझ कर उनकी पूजा करता है , ’ उत्तम पशु ’ कहा जाता है । यदि साधक केवल शिव की पूजा करता है वह ’ मध्यम पशु ’ है । यदि शिवा के साध शिव्व की पूजा करता है तो वह उत्तम है ही उसे हम पूर्व में ( द्र० . ६ . ५ ) कह आयें है ॥५ - ६॥
जो केवल विष्णु भक्त हैं और उन्हीं को अपना अधीश्वर समझता है तो वह मध्यम प्रकार का पशुअ है जो भूतों और देवताओं की सदा पूजा करते हैं । वे भी मध्यम पशु हैं किन्तु नरक गामी होते हैं इसमें संशय नहीं । हे महाप्रभो ! अपकी सेवा , हमारी सेवा , विष्णु एवं ब्रह्मा आदि की सेवा , अन्य सर्वभूतों की नायिकाओं जैसे यक्षिणीयों उया भूतिनियों की भी सेवा शुभप्रद होती है ॥७ - ९॥
जो पशु ब्रह्म कृष्णादि की सेवा करते है , अथवा जो श्री , तारक और ब्रह्म की सेवा करते हैं , ऐसे दोनों प्रकार के सेवक नरो में उत्तम हैं । ऐसे लोगों को असाध्य भूतादि देवता सभी कामनायें प्रदान करते हैं । किन्तु विष्णु सेवा परायण जन पशुमार्ग से वर्जित रहें ॥१० - ११॥