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भगीरथ n. (सू.इ.) सुविख्यात इक्ष्वाकुवंशीय राजा, जो सम्राट दिलीप का पुत्र था । अपने पितरों के उद्धार करने लिए इसने अनेकानेक प्रयत्न कर गंगा नदी को पृथ्वी पर लाया, एवं इस तरह अपने प्रपितामह असमंजस्, पितामह अंशुमत् एवं पिता दिलीप से चलता आ रहा प्रयत्न सफल किया । इसी कारण आगे चलकर लोगों ने अत्यधिक प्रयत्न के लिए ‘भगीरथ’ नाम को लाक्षणिक रुप में प्रयुक्त करना आरम्भ किया । इसके प्रपितामह असमंजस् के पिता सगर के कुल साठ हजार पुत्र थे, जो कपिल ऋषि के शाप के कारण दग्ध हो गये । बाद को कपिल ऋषि ने अंशुमत् तथा दिलीप से उनके मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा ‘यदि तुम लोग अपने पितरों का उद्धार ही करना चाहते हो, तो गंगा नदी की आराधना कर उसे पृथ्वी पर आने के लिये प्रार्थना करो, तभी तुम्हारे पूर्वजों का निस्तर सम्भव है’। अंशुमत् तथा दिलीप ने तप किया, लेकिन वे सफल न हो सके; उनका प्रयत्न अधूरा ही रहा । तब इसने हिमालय पर जा कर गंगा लाने के लिए घोर तप किया । गंगा इससे प्रसन्न हुयी, तथा पृथ्वी पर उतरने के लिए उसने अपनी अनुमति दे दी । अब समस्या थी कि, गंगा के तीव्र प्रवाह को पृथ्वी पर किस प्रकार उतारा जाय; कारण सम्भव था, पृथ्वी उसके वेग गति से बह जाये । इस कार्य के लिए गंगा ने इसे शंकर की सहायता लेने के लिए कहा । गंगा के कथनानुसार इसने शंकर की आराधना आरम्भ कर दी । पश्चात् शंकर उसकी तपस्या से प्रसन्न हो, गंगा के वेग प्रवाह को जटाओं के द्वारा रोकने के लिए तैयार हो गए ।
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भगीरथ n. -बाद में शंकर ने अपनी जटा के एक बाल को तोड कर गंगा को पृथ्वी पर उतारा । गंगा का जो क्षीण प्रवाह सर्वप्रथम पृथ्वी पर आया, उसे ही ‘अलकनंदा’ कहते हैं । बाद में, गंगा ने वेगरुप धारण कर भगीरथ के कथनानुसार, उसी मार्ग का अनुसरण किया, जिस जिस मार्ग से होता हुआ यह गया । अंत में यह कपिलआश्रम के उस स्थान पर गंगा को ले गया, जहॉं इसके पिता शाप से दग्ध हुए थे । वहॉं गंगा के स्पर्शमात्र से सभी पितर शाप से मुक्ति पाकर हमेशा के लिए उद्धरित हो गये [म.व.१०७] ;[वा.रा.बा.१.४२-४४] ;[भा.९.९.२-१०] ;[वायु.४७.३७, ८८.१६८] ;[ब्रह्म.७८] ;[विष्णु.४.४.१७] । गंगा को पृथ्वी पर उतारने का श्रेय इसे ही है । इसी लिये गंगा को इसकी कन्या कहा गया है, तथा इसके नाम पर ही उसे ‘भागीरथी’ नाम दिया गया है [ह.वं.१.१५-१६] ;[नारद.१.१५] ;[ब्रह्मवै.१.१०] । पद्म के अनुसार, गंगा आकाश से उतर कर शंकर की जटाओं में ही उलझ कर रह गयी । तब सगर ने शंकर से प्रार्थना कर, उसे पृथ्वी पर छोडने के लिए निवेदन किया [पद्म.उ.२१] । भगीरथ से सम्बन्धित गंगावतरण की कहाणी में, सगर का नाम जो पद्म पुराण में सम्मिलित किया गया है, वह उचित नहीं प्रतीत होता है । गंगा को पृथ्वी पर लाने के उपरांत यह पूर्ववत फिर राज्य करने लगा । यह धर्मप्रवृत्तिवाला दानशील राजा था । इसने दान में अपनी हंसी नामक कन्या कौत्स ब्राह्मण को दी थी [म.अनु.१२६.२६-२७] । इसने भागीरथी तट पर अनेकानेक घाट बनवाये थे । न जाने कितने यज्ञ कर ब्राह्मणों को हजारों सालंकृत कन्याएँ, एवं अपार धनराशि दक्षिणा के रुप में देकर उन्हें सन्तुष्ट किया था । इसके यज्ञ की महानता इसी में प्रकट है कि, उसमें देवगण भी उपस्थित होते थे [म.द्रो.परि.१. क्र.८] । ब्राह्मणों को अनेकानेक गायों का दान देकर इसने अपनी दानशीलता का परिचय दिया था । अकेले कोहल नामक ब्राह्मण को ही इसने एक लाख गायें दान में दी थी, जिसके कारण उसे उत्तमलोक की प्राप्ति हुयी [म.अनु.१३७.२६-२७, २००.२७] । श्रीकृष्ण ने भी इसकी दानशीलता की सराहना की है [म.शां.२९.६३-७०] । महाभारत में दिये गये गोदानमहात्म्य में भी इसका निर्देश प्राप्त है [म.अनु.७६.२५] । वैदिक वाङ्मय में निर्दिष्ट ‘भगीरथ ऐक्ष्वाक’ एवं यह सम्भवतः एक ही व्यक्ति रहे होंगे । भगीरथ के नाभाग (नभ), तथा श्रुत नामक दो पुत्र थे । इसके उपरांत श्रुत गद्दी पर बैठा । महाभारत में सोलह श्रेष्ठ राजाओं का जो आख्यान नारद ने सृंजय राजा को सुनाया था, उसमें भगीरथ की कथा सम्मिलित है [म.शां.५३-६३] ।
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भगीरथ n. आधुनिक विद्वानों के अनुसार, भगीरथ की यह कथा रुपात्मक है । गंगा पहले तिब्बत में पूर्व से उत्तर की ओर बहती थी, जिससे कि, उत्तरी भारत अक्सर आकालग्रस्त हो जाता था । इसके लिये भगीरथ के सभी पूर्वजों ने प्रयत्न किया कि, किसी प्रकार से गंगा के प्रवाह को घुमाकर दक्षिणीवाहिनी बनाया जाये । किन्तु वह न सफल हो सके । लेकिन भगीरथ अपने प्रयत्नों में सफल रहा, तथा उसने गंगा की धार मोड कर उत्तर भारत को हराभरा प्रदेश बना दिया । सगर के साठ हजार सम्भवतः उसकी प्रजा थी, जिस यह पुत्र के समान ही समझाता था ।
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भगीरथः [bhagīrathḥ] N. N. of an ancient king of the solar dynasty, the great-grandson of Sagara, who brought down, by practising the most austere penance, the celestial river Gaṅgā from heaven to the earth and from earth to the lower regions to purify the ashes of his 6, ancestors, the sons of Sagara. -Comp.
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