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पितामहः [pitāmahḥ] (-ही f.)
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m A paternal grandfather.
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pitāmaha m S A paternal grandfather.
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पितामह n. एक स्मृतिकार । एक प्राचीन धर्मशास्त्रकार के नाते से, इसका निर्देश ‘वृद्धयाज्ञवल्क्यस्मृति’ में किया गया है । इसके ‘शौच’ विषयक अभिमतों का निर्देश विश्वरुप ने किया है [याज्ञ. १.१७] । ‘मिताक्षरा’ एवं ‘अपरार्क’ में, पितामह के व्यवहारशास्त्र, आह्रिक एवं श्राद्धसंबंधी मतों का उद्धरण प्राप्त है । ‘स्मृतिचंद्रिका’ में भी, इसके व्यवहार एवं श्राद्धविषयक दस श्लोकों का उद्धरण लिया गया है । ‘पितामहस्मृति’ में विशेषतः ‘व्यवहारशास्त्र’ का विचार किया गया है । पितामह के अनुसार, वेद, वेदांग, सीमांसा, स्मृति, पुराण, एवं न्याय ये सारे ग्रंथ मिला कर ‘धर्मशास्त्र’ का रुप निर्धारित करते हैं [पिता.पृ.६०१] । इसकी स्मृति में, ‘क्रयपत्र,’ ‘स्थितिपुत्र’ ‘समाधिपत्र’ ‘विशुद्धिपत्र’ आदि ‘दस्तखतों’ की व्याख्या प्राप्त है । राजा के न्यायसभा में आवश्यक सेवकों एवं वस्तुओं की नामावलि पितामह ने दी है, जो इस प्रकार हैः
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