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पाणिनि n. लौकिक संस्कृत भाषा का वैयाकरण, जिसका ‘अष्टाध्यायी’ नामक ग्रंथ संस्कृतभाषा का श्रेष्ठतम व्याकरणग्रंथ माना जाता है । संस्कृत भाषा के क्षेत्र में, एक सर्वथा नये युग के निर्माण का कार्य आचार्य पाणिनि एवं इसके द्वारा निर्मित ‘पाणिनीय व्याकरण’ ने किया । यह युग लौकिक संस्कृत का युग कहा जाता है, जो वैदिक युग की अपेक्षा सर्वथा भिन्न है । जब वैदिक संस्कृत भाषा पुरानी एवं दुर्बोध होने लगी, तब उत्तर पश्चिम एवं उत्तर भारत के ब्राह्मणों में उस भाषा का एक आधुनिक रुप साहित्यिक भाषा के रुप में प्रस्थापित हुआ । इस नये साहित्यिक भाषा को व्याकरणबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य पाणिनि ने किया, एवं इसे भाषा को ‘लौकिक संस्कृत’ यह नया नाम प्रदान किया । पाणिनि केवल व्याकरणशास्त्र का ही आचार्य नहीं था । एक व्याकरणकार के नाते, लौकिक संस्कृत का भाषाशास्त्र एवं व्याकरणशास्त्र की सामग्री इकठ्ठा करते करते, तत्कालीन भारतवर्ष (५०० ई.पू) की राजकीय, सांस्कृतिक, सामजिक, एवं भौगोलिक सामग्री शास्त्रीय दृष्टि से एकत्र करने का महान् कार्य पाणिनि ने किया । अन्य व्याकरणकारों की अपेक्षा, इस कार्य में पाणिनि ने अत्यधिक सफलता भी प्राप्त की । इस कारण, पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ वेद के उत्तर कालीन एवं पुराणों के पूर्वकालीन प्राचीन भारतीय इतिहास का श्रेष्ठतम प्रमाणग्रंथ माना जाता हैं । ढाई सहस्त्र वर्षों के दीर्घ कालावधि के पश्चात्, पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ का पाठ जितने शुद्ध एवं प्रामाणिक रुप में आज भी उपलब्ध है, उसके तुलना केवल वेदों के विशुद्ध पाठों से की जा सकती है। किंतु वेदों के शब्द हमें विशुद्धरुप में प्राप्त हो कर भी, उनका अर्थ अस्पष्ट एवं धुँधला सा प्रतीत होता है । संस्कृत व्याकरणशास्त्र की श्रेष्ठ परंपरा के कारण, पाणिनीय व्याकरण के शब्द एवं अर्थ दोनों भी विशुद्ध रुप में आज भी उपलब्ध है । इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से, पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ का मूल्य वैदिक ग्रंथों की अपेक्षा आज अधिक माना जाता है । कई वर्षो के पूर्व, केवळ शब्दसिद्धि के दृष्टि से ‘पाणिनीय व्याकरण’ का अध्ययन किया जाता था । फिर कई अध्ययनशील लोगों ने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि में ‘पाणिनीय व्याकरण; की समालोचन करने का कार्य शुरु किया, एवं ऐतिहासिक सामग्री का एक नया विश्व, अभ्यासकों के लिये खोल दिया । ई.पू.५०० के लगभग भारत में उपलब्ध प्राचीन लोकजीवन की जानकारी पाने के लिये, एवं उस काल के ऐतिहासिक अंधयुग में नया प्रकाश डालने के लिये ‘पाणिनीय व्याकरण’ का अध्ययन अत्यावश्यक है, यह विचारप्रणाली आज सर्वमान्य हो चुकी है । इस विचारप्रणाली के निर्माण का बहुतांश श्रेय, बनारस विद्यापीठ के डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल एवं उनके ग्रंथ ‘पाणिनिकालीन भारतवर्ष’ को देना जरुरी है ।
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पाणिनि n. पुरुषोत्तमदेव के ‘त्रिकांडशेष’ कोश के अनुसार, पाणिनि को निम्नलिखित नामांतर प्राप्त थेः---पाणिन्, दाक्षीपुत्र, शालंकि, शालातुरीय एवं आहिक ।
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पाणिनि n. पतंजलि ने पाणिनी को ‘दाक्षीपुत्र’ कहा है, जिससे प्रतीत होता है की, पाणिनि के माता का नाम ‘दाक्षी’ था, एवं वह दक्षकुल से उत्पन्न था [महा.१.१२०] । इसके पिता का नाम ‘शलकं’ था, एवं पाणिनि; इसका कुलनाम था । हरिदत्त के अनुसार, पाणिपुत्र, ‘पाणिन,’ नामक ऋषि का पाणिनि पुत्र था [पदमंजरी २.१४] । छंदःशास्त्र का रचयिता पिंगल ऋषि पाणिनि का छोटा भाई था (षड्गुरुशिष्यकृत ‘वेदार्थदिपिका’) । व्याडि नामक व्याकरणाचार्य को ‘दाक्षायणि’ नामांतर था, जिससे प्रतीत होता हैं कि, वह पाणिनि का मामा था । व्याडि के ‘संग्रह’ नामक ग्रंथ की प्रशंसा पतजंलि ने की हैं [महा.२.३.६६] ।
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पाणिनि n. पाणिनि के विद्यादाता गुरु का नाम ‘वर्ष’ था [कथासरित.१.४.२०] । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार, शेष इसका गुरु था [ब्रह्मवै. प्रकृति.४.५७] । काव्यमिमांसा के अनुसार, वर्ष, उपवर्ष, पिंगल एवं व्याडी इन सहाध्यायियों के साथ, पाणिनि ने पाटलीपुत्र में शिक्षा प्राप्त की, एवं वहॉं शास्त्रपरीक्षा में यह उत्तीर्ण हुआ [काव्यमी.१०] । माहेश्वर को भी पाणिनि का गुरु कहा गया है, जिसका कोई आधार नही मिलता है । कई अभ्यासकों के अनुसार, पाणिनि की शिक्षा तक्षशिला में हुई थी (एस्. के. चटर्जी.‘भारतीय आर्यभाषा तथा हिंदी’ पृ.६६) । पाणिनी के अनेक शिष्य भी थे [महा.१.४.१] । उनमें ‘कौत्स’ नामक शिष्य का निर्देश ‘महाभाष्य’ में प्राप्त है [महा.३.२.१०८] । अष्टाध्यायी के प्राणभूत १४ सूत्रों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि, पाणिनि ने शिवोपासना कर के ‘१४ माहेश्वरी सूत्रों’ (प्रत्याहार सूत्रों) की प्राप्ति साक्षात् शिवजी से की थी, एवं उन सूत्रों के आधार पर अपने व्याकरणग्रंथ की रचना की ।
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