भजन - धरम दुर्‌यो कलिराज दिखाई ...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


धरम दुर्‌यो कलिराज दिखाई ॥

कीनों प्रगट प्रताप आपनौ सब बिपरीत चलाई ।

धन भौ मीत, धरम भौ बैरी पतितन सो हितवाई ॥

जोगी जती तपी संन्यासी ब्रत छाँड़यो अकुलाई ।

बरनास्त्रमकी कौन चलावै संतनहूमें आई ॥

देखत संत भयानक लागत भावते ससुर जमाई ।

संपति सुकृत सनेह मान चित ग्रह ब्यौहार बड़ाई ॥

कियो कुमंत्री लोभ आपुनों महामोह जु सहाई ।

काम क्रोध मद मोह मत्सरा दीन्हीं देस दुहाई ॥

दान लैनकौं बड़े पातकी मचलनकौं बँभनाई ।

लरन मरनकौं बड़े तामसी वारौं कोटि कसाई ॥

उपदेसनकौं गुरु गोसाईं आचरनैं अधमाई ।

ब्यासदासके सुकृत साँकरेमें गोपाल सहाई ॥

साधन बैरागी जड़ बंग ।

धातु रसायन औषध सेवत निसिदिन बढ़त अनंग ॥

सुक-बचननकौ रंग न लाग्यौ भयौ न संसै भंग ।

बिष बिकारगुन उपजै बित लगि सबै करत चित भंग ॥

बनमें रहत गहत कामिनि कुच सेवत पीन उतंग ।

धनि धनि साधु ! दंभकी मूरति, दियो छाड़ि हरि संग ॥

लोभ बचन बाननि अँग-अंगनि सोभित निकर निषंग ।

ब्यास आस जम पासि गरे, तिहि भावै राग न रंग ॥

जो दुख होत बिमुख घर आये ।

ज्यौं कारौ लागे कारी निसि, कोटिक बीछू खाये ॥

दुपहर जेठ जरत बारुमें घायन लौन लगाये ।

काँटन माँझ भिरै बिनु पनहीं, मूड़ै टोला खाये ॥

ज्यों बाँझहिं दुख होत सौतिकौ सुंदर बेटा जाये ।

देखतही मुख होत जितौ दुख बिसरत नहिं बिसराये ॥

भटकत फिरत निलज बरजत ही कूकर ज्यों झहराये ।

गारी देत बिलग नहिं मानत फूलत दमरी पाये ॥

अति दुख दुष्‍ट जगतमें जेते नैक न मेरे भाये ।

भूलि दरस नहिं कीजौ वाकौ, ब्यास बचन बिसराये ॥

सुने न देखे भगत भिखारी ।

तिनके दाम कामकौ लोभ न जिनके कुंजबिहारी ॥

सुक नारद अरु सिव सनकादिक, जे अनुरागी भारी ।

तिनको मत भागवत न समुझै सबकी बुधि पचि हारी ॥

रसना इंद्री दोऊ बैरिन जिनकी अनी अन्यारी ।

करि आहार बिहार परसपर बैर करत बिभचारी ॥

बिषइनिकी परतीति न हरिसों प्रीति रीति बाजारी ।

ब्यास आस-सागरमें बूडै़ आई भगति बिसारी ॥

जो सुख होत भगत घर आये ।

सो सुख होत नहीं बहु संपति, बाँझहिं बेटा जाये ॥

जो सुख होत भगत चरनोदक पीवत गात लगाये ।

सो सुख सपनेहू नहिं पैयत कोटिक तीरथ न्हाये ॥

जो सुख भगतनकौ मुख देखत उपजत दुख बिसराये ।

सो सुख होत न कामिहिं कबहूँ कामिनि उर लपटाये ॥

जो सुख कबहुँ न पैयत पितु घर सुतकौ पूत खिलाये ।

सो सुख होत भगत बचननि सुनि नैननि नीर बहाये ॥

जो सुख होत मिलत साधुनसों छिन-छिन रंग बढ़ाये ।

सो सुख होत न नेक ब्यासकौं लंक सुमेरहु पाये ॥

हरि बिनु को अपनौं संसार ।

माया मोह बँध्यो जग बूड़त, काल नदीकी धार ॥

जैसे संघट होत नावमें रहत न पैले पार ।

सुत संपति दारा सों ऐसे बिछुरत लगै न बार ॥

जैसे सपने रंक पाय निधि जानै कछू न सार ।

ऐसे छिन भंगुर देहीके गरबहि करत गँवार ॥

जैसे अंधरे टेकत डोलत गनत न खाइ पनार ।

ऐसे ब्यास बहुत उपदेसे सुनि-सुनि गये न पार ॥

कहत सुनत बहुतै दिन बीते भगति न मनमें आई ।

स्यामकृपा बिनु, साधुसंग बिनु कहि कौने रति पाई ॥

अपने अपने मत-मद भूले करत आपनी भाई ।

कह्यो हमारौ बहुत करत हैं, बहुतनमें प्रभुताई ॥

मैं समझी सब काहु न समझी, मैं सबहिन समझाई ।

भोरे भगत हुते सब तबके, हमरे बहु चतुराई ॥

हमही अति परिपक्व भये औरनिकै सबै कचाई ।

कहनि सुहेली रहनि दुहेली बातनि बहुत बड़ाई ॥

हरि मंदिर माला धरि, गुरु करि जीवनके सुखदाई ।

दया दीनता दासभाव बिनु मिलैं न ब्यास कन्हाई ॥

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Last Updated : December 21, 2007

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