संक्षिप्त विवरण - योग और आत्मसाक्षात्कार

कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


मनुष्य को जागना होगा , यह पहली बात है , किन्तु यह अत्यन्त कठिन व्यापार है । साधारण दृष्टि से जितनी आत्माओं की ओर दृष्टी जाती है तो देखते है वे सभी सुप्त हैं ,निद्रा में डुबे है । चाहे वे कर्मरत हों , ज्ञानी हों , चाहे किसी अन्य ही भूमि के हों , किन्तु उनमें अधिकांशतः आत्म -विमर्श नहीं है । मानव आत्मा जब अपनी विशुद्ध स्थिति में अवस्थित रहता है , तो वह अनवच्छिन्न चैतन्य शिव से अभिन्न रहता हैं ।

अशुद्ध अवस्था में चैतन्य का अवच्छेद रहता है , इसीलिए उस समय वह ग्राहक रुप में अर्थात् ‍ परिमित ‘अहम् ‍’ के रुप में खण्ड प्रमाता बनकर अभिव्यक्त होता है । खण्ड प्रमाता के समक्ष अन्य सब प्रमेय एवं ग्राह्य रुप में प्रतीत होते हैं । ग्राहक आत्मा अपने से पृथक ग्राह्य -सत्ता को इदं रुपेण देखता है । चैतन्य को अवच्छिन्नता की प्रतीति ग्राह्य की ओर आत्मा की उन्मुखता से होती है । पिण्ड -विशेष से सम्बन्ध रहने के कारण दूसरे के साथ अहन्ता य अभिमन अपूर्ण है । परन्तु की अवस्था में अनाश्रित शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वात्मक समग्र विश्व ही उनका रुप या शरीर बन जाता है । अपूर्ण अहं को पूर्णत का लाभ मिलना चाहिए , यही आत्मा का परम जागरण है , इसे परम लक्ष्य के रुप में अद्वैत साधना ही संकेत करती है ।

अनवच्छिन्न चैतन्य में नियत विशेष रुपों का भान नहीं होता । यदि हो , तब उस अवस्था को अनवाच्छिन्न न मानकर उसे ग्राहक कोटि में ही निविष्ट करना चाहिए । पूर्णत्व का भान होता है - अखण्ड सामान्य -सत्ता के रुप से । इस सामान्यत्मक महासत्ता का भान सविशेष और निर्विशेष उभय रुप से हो सकता है । सर्वातीत रिक्त -रुप ‘भा ’ मात्र है और पूर्ण -रुप सर्वात्मक ‘भा ’ है । ‘भा ’ स्वरुपता उभयत्र ही विद्यमान है । इस सामान्य -सत्ता का भान ही ‘स्वभाव ’ शब्द से बोधित होता है । वस्तुतः यह बहु के भीतर एक का अनुसन्धान है । ग्राहक आत्मा को पहले जो प्रतिनियत दर्शन होता था , वह इस अवस्था में कट जाता हैं , निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार क्रमशः अनवच्छिन्न चैतन्य की ओर प्रगति होती जाती है ।

आत्मा जब तक सुप्त रहता है , अर्थात् ‍ जब तक कुण्डलिनी प्रबुद्ध -शक्ति नहीं बनती , तब तक उसका स्तर -भेद स्वाभविक रुप से बना रहता है । उस समय उसकी अस्मिता योग्यता के तारतम्यानुसार देह , प्राण , इन्द्रिय अथवा शून्य या मा में क्रिया करती रहती है । यह स्मरण रखना चाहिए कि यह अस्मि -भाव वास्तविक संवित् ‍ का है , ग्राहक का नहीं है। पदों की बहुत संख्या है , इसका विस्तार -क्षेत्र भी अनाश्रित से लेकर पृथ्वी पर्यन्त है । किन्तु ये किसी पद के धर्म नहीं है , प्रत्युत चिति के धर्म हैं । किसी भी पद में उसकी धारना हो सकती है , धारणा का अभिप्राय है --दृढ अभिनिवेश । इसके प्रभा के कारण इच्छा -मात्र से क्रियान्त उद्‌भव हो सकता है ।

शुद्ध आत्मा का अस्मिता -जन्य जो अभिनिवेश है , वह शुद्ध अवस्था में विश्व में सर्वत्र विद्यमान है , क्योंकि शुद्ध आत्मा ग्राहक नहीं है यह पहले ही कहा गया है । बिन्दु से देह पर्यन्त विभिन्न स्थितियों में यह सर्वत्र ही व्यापक है , किन्तु व्याप्त रहने पर भी सर्वत्र ही विकास नही है , क्योंकि वह भावना -सापेक्ष है । जिसको कर्तृत्व , ईश्वर या स्वातंत्र्य कहा जाता है , वह अहन्ता का विकास छोडकर अन्य कुछ नहीं है । इसे ही तान्त्रिक सिद्ध गण चित्स्वरुपता कहते हैं । जितने प्रकार की सिद्धियाँ हैं , वे सब अहन्ता से ही अनुप्राणित हैं ।

तान्त्रिक -योग या ज्ञान -साधना का लक्ष्य सुप्त आत्मा को जागृत करना है । जिन आत्माओं से हम लोग परिचित हैं , वे प्रायः सुप्त हैं , क्योंकि इनकी दृष्टी से चिद् ‍ अचित् ‍ परस्पर विलक्षण हैं । सुप्त आत्मा की दृष्टि से ग्राहक चिद्रूप है और ग्राह्य अचिद्रूप । समग्र विश्व अखण्ड प्रकाश लोक है और आत्मा के ही अन्तः स्थित है । फिर भी सुप्त आत्माएँ उन्हे अपने बाहर समझती हैं । यह सुप्त आत्मा ही संसारी आत्मा है जिससे हम लोग परिचित है ।

आत्मा की सुप्ति भंग होने के साथ -साथ इस स्थिति में भी परिवर्तन होने लगता है , और यह शुद्ध विद्या के प्रभाव से होता है । इन आत्माओं की तात्कालिक अवस्था को ठीक -ठीक न सुप्ति और न जागरण ही कहा जाता है । यह अवस्था दोनों के बीच की कही जा सकती है । उस समय सुप्तिजनित -भेद की प्रतीति रहती है , किन्तु जागरण का अभेद भी प्रतीत होता रहता है । इन लोगों का संसार नहीं रहता , किन्तु संसार का संस्कार रह जाता है । इन लोगों की स्थिति न भव की और न उद्भव की कही जा सकती है , किसी अंश में यह पातञ्जल दर्शन के संप्रज्ञात समाधि के अनुरुप है , क्योंकि उस दशा में अविवेक रह जाता है । इसके बाद शुद्ध चित् ‍ का प्रकाश होता है , जो किसी अंश में पातञ्जल मार्ग के विवेकख्याति के सदृश है । यह स्वप्नवत् ‍ अवस्था है , न ठीक सुप्ति है और न ठीक जाग्रत् ‍ । इसीलिए एसे ठीक -ठीक प्रबुद्ध अवस्था नही कहा जा सकता । यहाँ यह स्मरण अवश्य रखना चाहिए कि इस अवस्था में कर्म -क्षय सिद्ध हो चुका है । इसलिए एक दृष्टि से इन आत्माओं को मुक्त भी किया जा सकता हैं । फिर भी तान्त्रिक दृष्टी से इन्हें मुक्त नहीं कहा जा सकता । तान्त्रिक परिभाषा में ये आत्माएँ रुद्राणु नाम से अभिहित होती हैं और पशु कोटि में गिनी जाती है । हाँ , ये आत्माएँ अवश्य ही सवित् ‌ मार्ग के सिद्धान्त -ग्रहण का अधिकार प्राप्त कर लेती हैं ।

इसके बाद ही यथार्थ जागरण की सूचना मिलती है । उस समय प्रमाता वस्तुतः प्रबुद्ध हो जाता है , इसमें भेद दृष्टी नहीं रहती , किन्तु साथ -साथ भेद और अभेद दोनों कें संस्कार रहते है । इस अवस्था में भी इंदरुपेण जडावस्था की प्रतीति रहती हैं । ये सभी आत्माएँ समग्र जगत् ‍ को अपने शरीर के सदृश अनुभव करती हैं । किसी प्रकार यह अवस्था ईश्वर के अनुरुप है , इसके भीतर अधिकाधिक वैचित्र्य है जो स्वानुभव -संवेद्य है ।

इसके बाद जागरण और भी स्पष्टरुप से होता है । उस समय प्रबुद्ध ‘भा की वृद्धी होती है और उसके प्रभाव से इंद -प्रतीति -वेद्य -प्रमेय अहं -रुप -आत्मस्वरुप में निमग्न होकर निमिषवत् ‍ प्रतीत होता है । इतना होने पर भी यह सुप्रबुद्ध अवस्था नहीं है ; यद्यपि प्रबुद्ध अवस्था से उत्कृष्ट अवश्य है । तान्त्रिक योगी गण इन आत्माओं को उद्भवी नाम से आख्यात करते है । ये सभी आत्माएँ अभेद -प्रतिपत्ति अथवा कैवल्य -प्राप्ति के द्वारा अहमात्मक -स्वरुप में निमग्न रहती हैं , यहाँ भी इदन्ता रहती है , किन्तु वह अहन्ता से आच्छादित रहने के कारण अस्फुट रहती है । इस अवस्था को किसी अंश में सदाशिव के अनुरुप माना जा सकता है । किन्तु यह भी पूर्णत्व नहीं है ।

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Last Updated : March 28, 2011

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