संक्षिप्त विवरण - चौसठ तन्त्र

कुण्डलिणी की सात्त्विक और धार्मिक उपासनाविधि रूद्रयामलतन्त्र नामक ग्रंथमे वर्णित है , जो साधक को दिव्य ज्ञान प्रदान करती है ।


शंकराचार्य द्वारा लिखित आनन्दलहरी में चौसठ तन्त्रो की चर्चा की गई है । आनन्द लहरी के प्रसिद्ध टीकाकार लक्ष्मीधर ने "चतुःषष्ट्‌या तन्त्रैः सकलमनुन्धाय भुवनम् ‍ " श्लोक संख्या -३१ का पाठ संशोधन करते हुए बतलाया है कि इस श्लोक में महामाय , शम्बर आदि चौसठ तन्त्रों के द्वारा सभी प्रपञ्चो की वञ्चना की बात की गयी है । इन तन्त्रों में से प्रत्येक में किसी न किसी सिद्धि का वर्णन किया गया है । अतः देवी के अनुरोध से भगवान् ‌ शंकर ने एक महत्त्वपूर्ण पुरुषार्थ साधक भगवती -तन्त्र का निर्माण किया । "चतुःशती " "नित्याषोडशिकार्णव " एवं भास्कर राय के सेतुबंध टीका में चौंसठ तन्त्रों की विस्तृत व्याख्या है । लक्ष्मीधर की व्याख्या के अनुसार ये कुलामार्ग के चौसठ तन्त्र वैदिक मार्ग से पृथक् ‍ और जगत् ‍ के विनाशक हैं । पैसठवें तन्त्र के विषय में कया गया है कि भग्वान् ‍ के मन्त्र -रहस्य शिव शक्ति दोनों के सम्मिश्रण से उभयात्मक है । चतुःशती में उल्लिखित चौसठ तन्त्रों का उल्लेख किया गया है , जिनमें बहुरुपाष्टक के भीतर आठ तन्त्रों में एक का नाम नहीं मिलता तथा अन्तिम सप्तक में सात की जगह आठ क्षपणक मत के तन्त्रो का उल्लेख किया गया है ।

इन सभी तन्त्रों ऐहिक फलों पर विशेष ध्यान है पारमार्थिक पर नहीं । इसीलिए लक्ष्मीधर ने इन्हें अवैदिक कहा है । लेकिन उन्होने यह भी प्रश्न उठाया है कि करुणावरुणालय उस परमेश्वर ने इस प्रकार की ऐहिकता सिद्धि वाले शास्त्रों की अवतारणा क्यों की ? और वहाँ उत्तर भी दिया है कि पशुपतिशिव ने सभी वर्णो के लिए तन्त्रों की रचना की । किन्तु प्रत्येक वर्ण का अधिकार सभी तन्त्रों के लिए नहीं है । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य (षडशी )विशुद्ध चन्द्रकला विद्या के अधिकारी है । शूद्र लोग ही इन चौसठ तन्त्रों के अधिकारी हैं । ये आठ विशुद्ध चन्द्रकला विद्याएँ अवैदिक चन्द्रकला विज्ञान से भिन्न हैं । इनके नाम १ . चन्द्रकला , २ज्योत्स्नावती , ३ कुलार्णव , ४ .कुलेश्वरी , ५भुवनेश्वरी , ६ .बार्हस्पत्य , ७दुर्वासामत और ८ . आठवीं का नाम नहीं दिया गया है । इन सभी तन्त्रों के त्रिवर्ण के साथ शूद्र भी अधिकारी हैं । पर त्रिवर्ण दक्षिणमार्गी और शूद्र वाम मार्गी होते है । पण्डित कविराज ने इस विद्या कुल मार्ग और समय मार्ग का मिश्रण बतलाया है ।

समय मार्ग या शुभागम पञ्चक

१ . सनक , २ .सनन्दन , ३ .सनत्कुमार , ४ .वसिष्ठ और ५ .शुक -संहिताओं को शुभागम पञ्चक कहा जाता है । यह वैदिक मार्ग है . । यह समयाचार के आधार पर अवलम्बित है । लक्ष्मीधर के अनुसार स्वयं शंकराचार्य इस समयाचार का अनुगमन करते थे । शुभागम पंचक में मूल विद्या कें अन्तर्गत षोडश विद्याएँ स्वीकृत हैं और चौसठ विद्याओं की चन्द्रज्ञानविद्या के अन्तर्गत सोलह नित्याओं की प्रधानता मान्य है । इसीलिए यह मार्ग कौल मार्ग कहा जाता है । ऊपर जिस एक पृथक पैसथवें तन्त्र की बात की गई है , भास्कर राय के अनुसार यह सम्भवतः "वामकेश्व्र तन्त्र " है , जिसके भीतर ही नित्याषोडशिकार्णव आ जाता है । "सौंदर्यलहरी " के टीकाकार गौरीकान्त के अनुसार यह पैसठवाँ तन्त्र ‘ज्ञानार्णव ’ तोडल की सूची में प्राप्त है । दूसरे लोग उस स्वतन्त्र तन्त्र को विशिष्ट मानकर उसे "तन्त्रराज " कहते है ।

नवयुग के चौसठ तन्त्र

" तोडल तन्त्र "," सर्वोल्लास तन्त्र " में आए चौसठ तन्त्रों के नामों की तुलना चतुःशती और श्रीकण्ठी की सूची से करनेके बाद इनमें अन्तर पाया है । " तोडल तन्त्र " की सूची सर्वान्द के सर्वोल्लास में दी गई है जिसमें काली , मुण्डमाला , तारा से लेकर कामाख्या तन्त्र मे चौसठ तन्त्रों का नाम उल्लिखित बतलाया है । इसकी सूची उपर्युक्त सूची से भिन्न है । इस तन्त्र की सन् ‌ १७५४ ई० की लिपिबद्ध की गई पोथी " इण्डिया आफिस लाइब्रेरी " लंदन में हैं ।
आठवीं सदी से पहले " जयद्रथयामल " की तन्त्र सम्बन्धी बहुत सी बाते स्पष्ट होती है । आठ प्रकार के यामलों का मूल है ब्रह्मयामल । यामलाष्टक की भाँति ही मंगलाष्टक , चक्राष्टक , शिखाष्टक आदि तन्त्र वर्ग की चर्चा जयद्रथयामल में है ।

जयद्रथयामल में विद्यापीठ के तन्त्रों का नाम लिया गया है । इस पुस्तक की एक पोथी नेपाल दरबार में संरक्षित है । यहाँ ११७४ ई० की लिखी पिंगलामत नामक भी एक पोथी है । जिसे ब्रह्मयामल का परिशिष्ट बतलाया गया है । पिंगलामत के अनुसार पुराने समय में ब्रह्मयामल के अनुसरण करने वाले सात तन्त्र प्रचलित थे जिनमें दुर्वासामत और सारस्वतमत प्रसिद्ध थे ।

इस प्रकार महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज ने तन्त्र साहित्य से परिचय कराने के लिए दस शिवागम , अष्टादश रुद्रागम , चौसठ भैरवागम , चौसठ तन्त्र -कुल मार्ग , शुभागम पंचक (समय मार्ग ) तथा नवयुग के चौसठ तन्त्रों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया है ।

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Last Updated : March 28, 2011

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