चतुःश्लोकी भागवत - श्लोक १३

एकनाथमहाराज कृत - चतुःश्लोकी भागवत


श्लोक १३
॥ श्लोक ॥
विद्योतमानाः प्रमदोत्तमा द्युभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः ॥ श्रीर्यत्र रूपिण्यरुगाय पादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः ॥१३॥

Translation - भाषांतर
॥ टीका ॥
ज्या परमपुण्यें अतिपावन ॥ त्या स्त्रिया वैकुंठीं विराजमान ॥ सौंदर्यगुणें विष्णुसमान ॥ तेज विराजमान शोभे कैसें ॥९४॥
लावण्य स्त्रियां केवीं दिसे ॥ तेथें स्वयें स्वरूपें लक्ष्मीवसे ॥ तद्रूपें स्त्रियां सौंदर्य भासे ॥ यापरी शोभतसे वैकुंठलोक ॥१९५॥
वैकुंठ नव्हे तें शुद्धगगन ॥ मेघस्थानीं गमे विमान ॥ तेथें विद्युल्लता स्त्रिया जाण ॥ सौंदर्य संपूर्ण झळकती त्या ॥९६॥
इतराठायीं लक्ष्मी असे ॥ तें ऐश्वर्ययोगे आभा से ॥ ते निजरूपें वैकुंठीं वसे ॥ यालागीं शोभतसे वैकुंठलोक ॥९७॥
लक्ष्मीसी अतिशय लावण्य ॥ यावया हेंचि कारण ॥ सप्रेमें सेवी हरिचरण ॥ यास्तव शोभमान अतिसौंदर्य ॥९८॥
जेणें सुख होय निजजीवा ॥ ऐसी गोड हे हरीची सेवा ॥ मेळवुनी उत्तम वैभवा ॥ रमा सद्भावा हरिचरणीं ॥९९॥


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Last Updated : 2017-07-04T21:14:04.6200000