छन्दोग श्राद्ध विधि – गोदान विधि
छन्दोग (सामवेद) परम्परा में श्राद्ध विधि अत्यंत पवित्र और सूक्ष्म वैदिक विधान है।
गोदान विधि भी यहीं दी जा रही है, किन्तु जहां जिस काल में किया जाता हो उस काल में गोदान करे।
तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां ददानि ॥
ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ ददस्व’ कहें।
गाय को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां रुद्रदैवतां ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले और गाय का पुच्छ ग्रहण कर पढ़े : ॐ क इदं कस्मा ऽअदात् कामः कामायाऽदात् । कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामः समुद्रमाविशत् । कामेन त्वा प्रतिगृह्णामि कामैतत्ते ॥
गोमूल्य दान विधि : यदि गोदान न कर सके तो गोमूल्य दान करे। गोमूल्य दान विधि इस प्रकार है।
तीन बार गोमूल्य की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ एतावत् द्रव्यमूल्यक सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
ब्राह्मण के पैर की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
ब्राह्मण को तिल-जल दे : ॐ इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां ददानि ॥
पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा व तिल-जल ब्राह्मण को दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम एतावत् द्रव्यमूल्योपकल्पितां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां रुद्रदैवतां ……… गोत्राय ……… शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
ब्राह्मण कुशजलादि ग्रहण कर ‘ॐ स्वस्ति’ कहें।
पुनः त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् द्रव्यमूल्योपकल्पित सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं …….. गोत्राय …….. शर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ॥
ब्राह्मण ‘ॐ स्वस्ति’ कहकर दक्षिणा ले ले।
अन्य वस्तुओं के दान विधि के लिये एक स्वतंत्र आलेख प्रकाशित किया जायेगा।
निर्देश :
जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त।
जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में किञ्चित अंतर संभव है।
सर्वप्रथम शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन कर कुशादि धारण करते हुए आत्मशुद्धि करे :
पवित्रीकरण मंत्र : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ श्राद्ध की सभी वस्तुओं पर जल छिड़क कर शरीर पर भी जल छिड़के।
दिग्रक्षण मंत्र : ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम । इदं श्राद्धं हृषीकेश रक्ष त्वं सर्वतो दिशः ॥
पञ्चगव्य निर्माण, प्राशन, प्रोक्षण आदि भी करे। अंगारभ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादनादि भी विधि के अनुसार करे।
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Last Updated : July 17, 2026

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