नावाहनं न दिग्बन्धो न दोषो दृष्टिसम्भवः । सकारुण्येन कर्तव्यं तीर्थश्राद्धं विचक्षणः ॥ तीर्थ श्राद्ध में आवाहन, दिग्बंध आदि नहीं होता, दृष्टि सम्बन्धी दोष भी नहीं होता। तीर्थ श्राद्ध विचक्षण होता है इसलिये कारुण्यभाव से करे।

पिण्डासनं पिण्डदानं पुनः प्रत्यवनेजनम् । दक्षिणा चान्नसङ्कल्पस्तीर्थश्राद्धेष्वयं विधिः ॥ वायु पुराण में बताया गया है कि पिण्डासन (वेदी, कुशा, अत्रावन), पिण्डदान और प्रत्यवनेजन करके दक्षिणा व संकल्प पूर्वक अन्न दान करे, तीर्थश्राद्ध की यही विधि होती है।

पिण्ड द्रव्य – तीर्थ श्राद्ध के लिये पायस, चरु, सक्तु, तण्डुल, तण्डुलपिष्ट, यव-गोधूम चूर्ण, तिल, गुड़, फल, मूल आदि द्रव्य अथवा तीर्थ विशेष पिण्ड द्रव्य कहा गया है एवं पिण्ड का आकार कच्चे आंवले फल के बराबर बताया गया है ।

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Last Updated : July 16, 2026

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