ज्ञातव्य बातें

प्रस्तुत पूजा प्रकरणात भिन्न भिन्न देवी-देवतांचे पूजन, योग्य निषिद्ध फूल यांचे शास्त्र शुद्ध विवेचन आहे.


स्नान, संध्या, जप, देवपूजा, वैश्वदेव और अतिथिपूजा-ये छ: नित्यकर्म माने गये है । इनमें स्नान, संध्या, जप तथा देवपूजाके सम्बन्धमें लिखा जा चुका है । अब वैश्वदेवके सम्बन्धमें लिखा जा रहा है । देवपूजाके बाद वैश्वदेवका विधान है ।
संध्या न करनेसे जैसे प्रत्यवाय (पाप) लगता है, वैसे ही बलिवैश्वदेव न करनेसे भी प्रत्यवाय लगता है । भोजनके लिये जो हविष्यान्त घरमें पकाया जाता है, उसीसे वैश्वदेव करना चाहिये । अभावमें साग, पत्ता, फल, फूलसे भी करे । गेहूँ, चावल (जो उसना न हो), तिल, मूँग, जौ, मटर, कँगुनी, नीवार-ये हविष्यान्न है । घी, दूध या दही मिलाकर होम करे । तेल और क्षार-पदार्थ निषिद्ध है । कोदो, चना, उडद, मसूर, कुलथी-ये अन्न भी निषिद्ध है । भोजनके लिये पकाया हुआ हविष्यान्न ही बलिवैश्वदेवका मुख्य उपकरण है । किंतु इस कर्मकी अबाधित आवश्यकता देखकर शास्त्रने छूट दे दी है कि यदि पकाया अन्न सुलभ न हो तो कच्चे अन्नसे, यदि हविष्यान्न न हो तो अहविष्यान्नसे, यदि अन्न सुलभ न हो तो फल-फूलसे और यह भी सम्भव न हो तो जलसे ही वैश्वदेव करे।
इसी तरह वैश्वदेवमें नमक निषिद्ध है । किंतु पाकमें कहीं वह पड ही गया हो तो क्या करे ? तब शास्त्रने उपाय बतलाया है कि कुण्डके उत्तरकी ओरकी गर्म राख हटाकर होम करे । जब दूसरेके घरमें सपरिवार भोजन करना हो, तब तो चूल्हा जलानेका प्रश्न नहीं उठता, किंतु शास्त्रका आदेश है कि उस दिन भी बलिवैश्वदेव करे । उपवासके दिन भी बलिवैश्वदेव करना चाहिये । पक्वान्नके अभावमें सूखे अन्नसे अथवा फल-फूलसे यह कर्म करे । जिस अग्निमें भोजन तैयार होता है, उसी अग्निमें होम करे । घरके बीचमें ताँबेके कुण्डमें यह अग्नि रखकर होम करना चाहिये अथवा अठारह अंगुलकी चौकोर वेदी बना ले, जिसमें तीन, दो या एक मेखला हो । यदि ताम्रकुण्ड या वेदी न हो तो कच्ची मिट्टीके पात्र, ताम्रपात्र आदि अथवा पके मिट्टीके पात्रमें भी वैश्वदेव करे । चूल्हा, लौहपात्र और खपरेका निषेध है । अविभक्त परिवारमें इस कर्मको मुख्य व्यक्ति ही करे । एकके करनेसे ही परिवार-भरका किया हुआ मान लिया जाता है । दूसरे देशमें पृथक्‍ पाक करनेपर पिताके रहते पुत्र या ज्येष्ठ भाईके रहते छोटा भाई भी बलिवैश्वदेव करे । स्त्रियाँ भी बिना मन्त्रके वैश्वदेव कर सकती है ।

बलिवैश्वदेवके सम्पन्न होनेके बाद भगवान्‍ को भोग लगाये । कारण, बलिवैश्वदेवसे अन्नका संस्कार हो जाता है । भोग लगानेके लिये अन्न अलग निकाल कर रख ले । वैश्वदेव होनेके पहले यदि अतिथि आ जाय, तो इस यज्ञके लिये अलगसे अन्न निकालकर उसे ससम्मान भिक्षा देकर बिदा करे । अतिथिको प्रतीक्षा नहीं करानी चाहिये । वह न आये तो अग्निमें ही हवन करना चाहिये । आवश्यक हो तो वैश्वदेवकी अग्निदेवकी अग्निको बाँसकी फूँकनीसे फूँककर प्रज्वलित करे । हाथसे, सूपसे और अपवित्र वस्त्रसे हाँककर प्रज्वलित करनेका निषेध है । दाहिने हाथको उत्तान कर, चारों अँगुलियोंको सटाकर, अँगूठेकी सहायतासे मौन रहकर, बायें हाथको हृदयसे लगाकर और दाहिना घुटना टेककर हवि दे । घृतमिश्रित चावल या रोटीसे आहुति देनी चाहिये । आहुतिका परिमाण बेर या आँवलेके बराबर हो । यहाँ ‘घृत’ शब्दसे घी, दूध, कुसुम आदिका तेल-ये सभी गृहीत होते है । अर्थात्‍ घृतके अभावमें इन वस्तुओंका प्रयोग किया जा सकता है ।

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Last Updated : December 02, 2018

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