चैत्र कृष्णपक्ष व्रत - होलामहोत्सव

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


प्रदोषव्रत ( स्कन्दपुराण ) -

यह व्रत शिवजीकी प्रसन्नता और प्रभुत्वकी प्राप्तिके प्रयोजनसे प्रत्येक मासके कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंमें त्रयोदशीको किया जाता है । शिवपूजन और रात्रि - भोजनके अनुरोधसे इसे प्रदोष कहते हैं । इसका समय सूर्यास्तसे दो घड़ी रात बीतनेतक है । जो मनुष्य प्रदोषके समय परमेश्वर ( शिवजी ) के चरण - कमलका अनन्य मनसे आश्रय लेता है उसके धन - धान्य, स्त्री - पुत्र, बन्धु - बान्धव और सुख - सम्पत्ति सदैव बढ़ते रहते है । यदि कृष्ण पक्षमें सोम और शुक्ल पक्षमें शनि हो तो उस प्रदोषका विशेष फल होता है । कृष्ण - प्रदोषमें प्रदोषव्यापिनी परविद्ध त्रयोदशी ली जाती है । उस दिन सूर्यास्तके समय पुनः स्त्रान करके शिवमूर्तिके समीप पूर्व या उत्तरमुख होकर बैठे और हाथमें जल, फल, पुष्प और गन्धाक्षत लेकर ' मम शिवप्रासादप्राप्तिकामनया प्रदोषव्रताङीभू तं शिवपूजनं करिष्ये ' यय संकल्प करके भालपर भस्मके भव्य तिलक और गलेमें रुद्राक्षकी माला धारण करे । उत्तम प्रकारके गन्ध, पुष्प और बिल्व - पत्रादिसे उमा - महेश्वरका पद्धतिके अनुसार पूजन करे । यदि साक्षात् शिवमूर्तिका सांनिध्य प्राप्त न हो सके तो भीगी हुई चिकनी मिट्टीको ' हराय नमः ' से ग्रहण करके ' महेश्वराय नमः ' से कुक्कुटाण्ड अथवा कराङ्गष्ठके प्रमाणकी मूर्ति बनाये । फिर ' शूलपाणये नमः ' से प्रतिष्ठा और ' पिनाकपाणये नमः ' से आवाहन करके ' शिवाय नमः ' से स्त्रान करावे और ' पशुपतये नमः ' से गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण करे । तत्पश्चात् ' जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिंभञ्जन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥ प्रसीद मे महाभाग संसारार्तस्य खिद्यतः । सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥' से प्रार्थना करके ' महादेवाय नमः से पूजित मूर्तिका विसर्जन करे । ....... इस व्रतकी पूर्ण अवधि २१ वर्षकी है परंतु समय और सामर्थ्य न हो तो उद्यापन करके इसका विसर्जन करे । विशेष विधान आगे वैशाखादिके व्रतोंसे जान सकते हैं ।

१. शिवपूजानक्तभोजनत्मकं प्रदोषम् । ( हेमाद्रि )

२. प्रदोषोऽस्तमायादूर्ध्वं घटिकाद्वयमिष्यते । ( माधव )

३. ये बै प्रदोषसमये परमेश्वरस्य कुर्वन्त्यन्यमनसोऽड्घ्रिसरोजसेवाम् ।

नित्यं प्रवृद्धधनधान्यकलत्रपुत्रसौभाग्यसम्पदधिकास्त इहैव लोकाः ॥ ( स्कन्द० )

४. यदा त्रयोदशी कृष्णा सोमवारेण संयुता ।

यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ॥

तदातीव फलं प्राप्तं धनपुत्रादिकं लभेत् । ( हेमाद्रि )

५. शुक्लत्रयोदशी पूर्वा परा कृष्णा त्रयोदशी । ( माधव )

६. हरो महेश्वरश्चैव शूलपाणिः पिनाकधृक् ।

शिवः पशुपतिश्चैव महादेवेति पूजयेत् ॥ ( शिवपूजा )

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Last Updated : January 16, 2009

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