भजन - झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंड...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने ॥टेक॥

पौन उमाह उछाह धरती सोच सावन मास ।

लाजके जहँ उड़त बगुले मोर हैं जग हाँस ॥१॥

हरष-सोक दोउ खंभ रोपे सूरत डोरी लाय ।

बिरह पटरी बैठि सजनी उमँग आवै जाय ॥२॥

सकल बिकल तहँ देत झोके बिपत गावनहार ।

सखी बहुतक रंग राती रँगी पाँचौं नार ॥३॥

नैन बादल उमँगि बरसै दामिनी दमकात ।

बुद्धिकौ ठहराव नाहीं, नेह की नहिं जात ॥४॥

सुकदेव कहैं, कोइ बली झूले, सीस देत अकोर ।

चरनदास भये बौरे जाति-बरन-कुल छोर ॥५॥

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Last Updated : December 20, 2007

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