सुमित्रानंदन पंत - गाँव के लड़के

ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।


गाँव के लड़के

मिट्टी से भी मटमैले तन,

अधफटे, कुचेले जीर्ण वसन,

ज्यों मिट्टी के हो बने हुए

ये गँवई लड़के - भू के धन !

कोई खंडित, कोई कुंठित,

कृश बाहु, पसलियाँ रेखांकित,

टहनी सी टाँगें, बड़ा पेट,

टेढ़े मेढ़े, विकलांग घृणित !

विज्ञान चिकित्सा से वंचित,

ये नही धात्रियों से रक्षित,

ज्यों स्वास्थ्य सेज हो, ये सुख से

लोटते धूल में चिर परिचित !

पशुओं सी भीत मूक चितवन,

प्राकृतिक स्फूर्ति से प्रेरित मन,

तृण तरुओं-से उग-बढ़, झर-गिर,

ये ढोते जीवन क्रम के क्षण !

कुल मान न करना इन्हे वहन,

चेतना ज्ञान से नही गहन,

जग जीवन धारा में बहते

ये मूक, पंगु बालू के कण !

कर्दम में पोषित जन्मजात,

जीवन ऐश्वर्य न इन्हे ज्ञात,

ये सुखी या दुखी ? पशुओं-से

जो सोते जगते साँझ प्रात !

इन कीड़ो का भी मनुज बीज,

यह सोच ह्रदय उठता पसीज,

मानव प्रति मानव की विरक्ति

उपजाती मन में क्षोभ खीज !

Translation - भाषांतर
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References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

फरवरी' ४०

Last Updated : 2012-10-11T13:05:56.6730000