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श्रीकृष्ण माधुरी - पद २१ से २५

इस पदावलीके संग्रहमें भगवान् श्रीकृष्णके विविध मधुर वर्णन करनेवाले पदोंका संग्रह किया गया है, तथा मुरलीके मादकताका भी सरस वर्णन है ।


२१.
राग ललित
छोटी-छोटी गुडीयाँ, अँगुरियाँ छबीली छोटी,
नख जोती मोती मानौ कमल दलनि पर।
ललित आँगन खेलै, ठुमुक ठुमुक डोलै,
झुनुक झुनुक बोलै पैंजनी मृदु मुखर ॥१॥
किँकिनी कलित कटि हाटक रतन जटि,
मृदु कर कमलन पहुँची रुचिर बर।
पियरी पिछौरी झीनी, और उपमा न भीनी,
बालक दामिनी मानौ ओढै बारौ बारिधर ॥२॥
उर बघनहा, कंठ कठुला, झँडुले बार,
बेनी लटकन मसि बुंदा मुनि मन हर।
अंजन रंजित नैन, चितवनि चित चोरै,
मुख सोभा पर बारौं अमित असमसर ॥३॥
चुटुकी बजावति नचावति जसोधा रानी,
बाल केलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर।
किलकि किलकि हँसे, द्वै द्वै दँतुरियाँ लसै,
सूरदास मन बसै तोतरे बचन बर ॥४॥

२२.
राग बिलावल
( माधौ ) तनक चरन औ तनक तनक भुज,
तनक बदन बोलै तनक सौ बोल।
तनक कपोल, तनक सी दँतियाँ,
तनक हँसनि पै लेत हैं मोल ॥१॥
तनक करन पर तनक माखन लिए,
तनक सुनै सुजस पावत परम गति,
तनक कहत तासौं नँद के सुवन ॥२॥
तनक रीझ पै देत सकल तन,
तनक चितै चित बित के हरन।
तनकै तनक, तनक करि आवै ’ सूर ’,
तनक कृपा कै दीजै तनक सरन ॥३॥
२३.
मेरी माई, स्याम मनोहर जीवन। निरखी नैन भूले जु बदन छबि, मधुर हँसन पै पीवन ॥१॥
कुंतल कुटिल, मकर कुंडल, भ्रुव, नैन बिलोकनि बंक। सुधा सिंधु तैं निकसि नयौ ससि राजत मनु मृग अंक ॥२॥
सोभित सुवन मयूर चंद्रिका नील नलिन तनु स्याम।
मनौ नछत्र समेत इंद्र धनु, सुभग मेघ अभिराम ॥३॥
परम कुसल कोबिद लीला नट मुसुकनि मन हरि लेत।
कृपा कटाच्छ कमल कर फेरत, ’ सूर ’ जननि सुख देत ॥४॥
२४.
राग सारंग
हरि हर संकर, नमो नमो।
अहिसाई, अहि अंग बिभूषन, अमित दान, बल बिष हारी। नीलकंठ, बर नील कलेवर, प्रेम परस्पर कृतहारी ॥१॥ चंद्रचूड, सिखि चंद सिरोरुह, जमुनाप्रिय, गंगाधारी। सुरभि रेनुतन, भस्म विभूषित, वृष बाहन, बन व्रुष-चारी ॥२॥
अज अनीह अनिरुद्ध एकरस, यहै अधिक ए अवतारी। सूरदास सम रुप नाम गुन, अंतर अनुचर अनुसारी ॥३॥

बाल-छबि-वर्णन
२५.
राग बिलावल
बरनौ बालवेष मुरारी।
थकित जित तित बपन के, चहुँ दिसा छिटके झारि।
सीस पर धरि जटा, मनु सिसु रुप कियौ त्रिपुरारी ॥२॥
तिलक ललित ललाट केसर बिंदु सोभाकारि।
रोष अरुन तृतीय लोचन रह्यौ जनु रिपु जारि ॥३॥
कंठ कठुला नील मनि, अंभोज माल सँवारि।
गरल ग्रीव, कपाल उर, इहिं भाइ भए मदनारि ॥४॥
कुटिल हरिनख हिए हरि के हरषि निरखित नारि।
ईस जनु रजनीस राख्यौ भाल तैं जु उतारि ॥५॥
सदन रज तन साम्य सोभित सुभग इहिं अनुहारि।
मनौ अंग बिभूति राजित संभु सो मधुहारि ॥६॥
त्रिदस पति पति असन कौं अति जननि सौं करै आरि।
सूरदास बिरंचि जाकौं जपत निज मुख चारि ॥७॥

छोटे-छोटे चरण (तथा) सुन्दर नन्ही अँगुलियोंकी नख-ज्योति ऐसी है मानो कमलदलोंपर मोती हों । सुन्दर आँगनमे खेलते हुए ठुमुक-ठुमुक चलते हैं, (जिससे) मुखरित नूपूरोंकी कोमल ध्वनि रुनझुन करती बोल रही है । कमरमे रत्नजटित स्वर्णकी मनोहर किंकिणी और कोमल करकमलोमें सुन्दर श्रेष्ठ पहुँची है । पीली पतली पिछौरी ओढे है; जिसके लिये दूसरी कोई उपमा सरस नही हो सकती; ऐसा लगता है मानो मेघशिशुने बालक बिजली ओढ रखी हो । वक्षस्थलपर बघनखा, गलेमें कठुला झूडूले ( गर्भावस्थाके ) केश है; चोटीका लटकना तथा कज्जलका बिन्दु ( डिठौना ) तो मुनियोंके भी मनको हरण करनेवाला है । अञ्जन-लगे लोचनोसे देखना चित्तको चुराये लेता है और मुखकी शोभापर तो अपार कामदेवोंको न्योछावर कर दूँ । व्रजरानी यशोदा चुटकी बजाकर (मोहनको) नचाती हुई प्रेममे भरकर (श्यामकी) बालक्रीडाका गान करती तथा (उन्हे) पुचकारती जाती है  । (मोहन भी) किलकारी मार-मारकर हँसते है, जिससे ( ऊपर-नीचेकी) दो-दो दँतुलियाँ चमकती है । सूरदासको मनमे (मोहनके) वे श्रेष्ठ तोतले शब्द बस जायँ ॥२१॥
 
(श्यामसुंदरके) छोटे-छोटे चरण एवं छोटी-छोटी भुजाएँ हैं, छोटेसे मुखसे थोडी-सी बात कहते है । छोटे-छोटे कपोल एवं छोटी-सी दँतुलियाँ हैं, जो तनिक-से हँसनेपर (देखनेवालेको) मोल ले लेते है । (वे श्यामसुन्दर) छोटे-से हाथोंपर तनिक-सा मक्खन लिये है; उनके तनिक-सा दृष्टिपात करते ही समस्त लोकोंकी सृष्टि हो जाती है । इनक तनिक-सा सुयश सुननेसे ही (प्राणी) परमपद पा जाता है, इसीलिये ये नन्दनन्दन छोटे-से थोडी कृपा करनेसे प्रभो ! यह सूरदास आपके तनिक पास आ जायगा, अतः तनिक-सी कृपा करके इसे तनिक शरण दे दीजिये ॥२२॥

( माता अथवा सखी कहती है -) ’ माई श्यामसुन्दर मेरा जीवन है । मधुर हँसीके साथ दूध पीते समय इसके मुखकी शोभा देखकर ( मेरे ) नेत्र ( अपनी चञ्चलता ) भूल जाते है । घुँघराली अलके है, कानोमे मकराकृत कुंडल है तथा टेढी भौंहे और तिरछे नेत्रोंसे देखना ऐसा लगता है मानो सुधाके समुद्रसे निकला हुआ नया चन्द्र मृगको अंकमे लिये  हो । नीलकमले समान श्याम शरीरवाले श्रीकृष्णके मस्तकपर श्याम-मयुर-शावकके पंखकी चन्द्रिका ( इस प्रकार ) शोभित है मानो तारागणोके साथ इंद्रद्गनुष ( सुंदर मेघपर  ) शोभित हो । ( इन ) अत्यंत चतुर एवं  निपुण लीला-नटका मुसकराना मनको हर लेता है । ’ सूरदासजी कहते है- ( वे ) कृपाकटाक्षपूर्वक कर-कमल फिराते हुए माताको आनन्द प्रदान कर रहे है ॥२३॥

कल्याण करनेवाले भगवान हरि तथा शंकरजी ( दोनोंको ) बार-बार नमस्कार । एक शेषनागपर सोते है तो दू्सरे शरीरमे सर्पोका आभूषण धारण करते है, दोनो ही असीम दानी एवं बलके के वीष गर्व को हरण करनेवाले हैं । एक अपने कण्ठमे ( विषकी ) नीलि्माको धारण किये है तो दूसरेका ( समूचा ) शरीर हद सुन्दर नीलवर्ण है ; दोनोने प्रेमवश एक-दूसरेको अपने गलेका हार बना रखा है । एक ( अपने ) जटाजूटपर चन्द्रमा ( और ) दूसरे ( अपने   ) बालोमे मयुरपिच्छकी चन्दिका धारण करते है । एक यमुनाकान्त और दूसरे गंगाधर है । एकके शरीरमे गायोंके खुरोसे उडी धूलि लगी है तो दूसरेके अंग भस्मसे विभूषित है । एक बैलपर चढते है तो दूसरे ( गाय-) बैलोको वनमे चराते है । दोनो अजन्मा है, इच्छारहित है, स्वतंत्र ( मुक्त ) है, एकरस है; किन्तु इतनी अधिकता श्यामसुन्दरमे है कि वे अवतार धारण करनेवाले है । सूरदासजी कहते है- दोनो रुप, नाम और गुणोमे समान है; दोनोमे जो अन्तर जान पडता है, वह भक्तोंके हृदयकी भावनाके अनुसार है ॥२४॥

मै श्रीमुरारिके बालरुपका वर्णन करता हू। श्रीनन्दनन्दनको देखकर देवता तथा मुनिगण जहाँ-के-तहाँ  थकित ( स्तम्भित ) हो रहे है । मुण्डनरहित (अर्थात कोमल ) केश-कलाप ( इस प्रकार ) मस्तकपर चारो ओर फैले झूम रहे है, मानो मस्तकपर जटा धारण किये शंकरजीने शिशुरुप बना लिया हो । सुन्दर ललाटपर केसरकी बेदी ( ऐसी ) सुन्दर लग रही है मानो  क्रोधसे लाल हुआ ( शंकरजीका ) तीसरा नेत्र अपने शत्रु कामदेवको भस्म कर रहा हो । गलेमे नीलमणिका का कठुला तथा कमलकी माला ( इस भाँति ) सँवारी गयी है मानो कण्ठमे विष धारण करनेवाले ( नीलकण्ठ ) तथा वक्ष:स्थलपर मुण्डमाला पहिननेवाले मदन-अरि ( शंकर ) इस रुपमे हो गये हो । गोपिया श्यामके वक्षःस्थलपर टेढे बघनखाको हर्षित होकर देख रही है । मानो शंकरजीने ललाटसे उतारकर चन्द्रमाको ( अपने ) वक्षःस्थलपर रख लिया हो । मधु दैत्यके नाशक ( श्यामसुन्दर ) के श्याम शरीरमे भवनकी धूलि ( लगकर ) इस प्रकार शोभित और भली लग रही है मानो वे भस्मविभूषित देहवाले ( साक्षात ) शंकर ही हो । सूरदासजी कहते है कि जिनके नामका जप ब्रह्माजी अपने चारो मुखोसे करते है, वे ही श्याम मातासे चन्द्रमाको खानेके लिये अत्यन्त मचल रहे है ॥२५॥


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Last Updated : November 01, 2010

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